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हेलसिंकी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से फिनलैंड की राजधानी हेलसिंकी में सोमवार को मिलने पर कहा कि हमारे पास बात करने के लिए बहुत अच्छे मुद्दे हैं। व्यापार से लेकर सैन्य और मिसाइलों तक चीन से परमाणु तक हम सब कुछ पर चर्चा कर रहे हैं। हम चीन, हमारे पारस्परिक मित्र, राष्ट्रपति शी के बारे में कुछ बात करेंगे।जून महीने में दुनियाभर के कूटनीतिक विशेषज्ञों की नजरें सिंगापुर की ओर लगी हुई थीं। 12 जून को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन से ऐतिहासिक बैठक कर रहे थे। अब एक माह बाद हेलसिंकी का नंबर है। सोमवार को फिनलैंड की राजधानी में ट्रंप रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मिलने वाले हैं। यह इन दोनों नेताओं की पहली बैठक होगी। बैठक के लिए ट्रंप हेलसिंकी पहुंच चुके हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रूसी दखल के आरोपों के मद्देनजर हर कोई जानना चाह रहा है कि दोनों नेताओं में क्या बातचीत होती है?यूरोप आने से पहले जब ट्रंप ने कहा था कि उनकी यात्रा का सबसे आसान हिस्सा हेलसिंकी प्रवास रहेगा, तो कई लोगों की भवें तन गई थीं। ब्रसेल्स और लंदन प्रवास के दौरान अब तक ट्रंप की यात्रा विवादों में रही है। इस बीच, अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में रूसी दखल का मामला फिर गरमा गया है। कहा जा रहा है कि राष्ट्रपति चुनाव जीतने में पुतिन ने ट्रंप की गुप्त रूप से मदद की थी। ऐसे में इसकी उम्मीद कम ही है कि बैठक में यह अकेला मुद्दा हावी रहेगा।रूसी राष्ट्रपति कार्यालय ने कहा है कि वाशिंगटन और मॉस्को का द्विपक्षीय संबंध बेहद खराब है। हमें एक नई शुरुआत करनी होगी। हालांकि, हम ट्रंप को बातचीत के योग्य साझीदार मानते हैं।

जकार्ता। इंडोनेशिया में 48 वर्षीय सुगिटो की मगरमच्‍छ के काटने से मौत हो गई। पापुआ प्रांत में मृतक के अंतिम संस्‍कार के बाद गुस्‍साई भीड़ ने सैंकड़ों मगरमच्‍छों की जान ले ली।
आवासीय इलाके के पास है मगरमच्‍छों का फार्म;-पुलिस के अनुसार, मृतक सुगिटो अपने पशुओं के चारे के लिए घास ढूंढने के दौरान मगरमच्छों के बाड़े में गिर गया। उन्होंने बताया कि मगरमच्छ ने मृतक सुगिटो के एक पैर को काट लिया था और एक मगरमच्छ के पिछले हिस्से से टकराकर उसकी मौत हो गई। अधिकारियों ने बताया कि आवासीय इलाके के पास फार्म की मौजूदगी को लेकर गुस्साए सुगिटो के रिश्तेदार और स्थानीय निवासी स्थानीय पुलिस थाने पहुंचे। स्थानीय संरक्षण एजेंसी के प्रमुख बसर मनुलांग ने कहा कि उन्हें बताया गया था कि फार्म मुआवजा देने को तैयार है।
गुस्‍साई भीड़ ने 292 मगरमच्‍छों को मार डाला:-अधिकारियों ने बताया कि मौत के बाद गुस्‍साई भीड़ चाकू, छुरा और खुरपा लेकर फार्म पहुंच गई और 4 इंच लंबे बच्चों से लेकर दो मीटर तक के 292 मगरमच्छों को मार डाला। पुलिस और संरक्षण अधिकारियों का कहना था कि वह इस भीड़ को रोक पाने में असमर्थ थी। अधिकारियों ने कहा कि वे इसकी जांच कर रहे हैं और आपराधिक आरोप भी तय किए जा सकते हैं। इंडोनेशिया द्वीपसमूह में मगरमच्छों की कई प्रजातियों समेत विभिन्न वन्यजीव पाए जाते हैं। मगरमच्छों को संरक्षित जीव माना जाता है।दो साल पहले भी यहां एक रूसी पर्यटक की मौत भी मगरमच्‍छ के काटने के कारण हुई थी।

एस्टोरिया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में स्वर्णिम अध्याय लिखने वाली गदर पार्टी के बारे में अब अमेरिका के ओरेगन राज्य में स्कूली बच्चों को पढ़ाया जाएगा। गदर पार्टी की स्थापना के 105 वर्ष पूरा होने के मौके पर आयोजित समारोह में ओरेगन की अटार्नी जनरल एलन एफ रोसेनब्लूम ने यह घोषणा की। उन्होंने कहा कि गदर पार्टी का इतिहास अब राज्य के स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा होगा। इस कार्यक्रम का आयोजन गदर मेमोरियल फाउंडेशन द्वारा किया गया था।कार्यक्रम में मौजूद ओरेगन की गवर्नर केट ब्राउन ने कहा कि लगभग एक सदी पहले गदर पार्टी द्वारा भारत और पश्चिमी देशों में उठाए गए कदमों से भारत की आजादी का मार्ग प्रशस्त हुआ था। रोसेनब्लूम ने कहा कि आपका इतिहास मिश्रित है और नस्लवाद और भेदभाव का वैसा ही शिकार रहा है, जैसा आज कल हम अमेरिका में देख रहे हैं। अमेरिका जरूरी काम के लिए बाहरी लोगों को बुलाना तो चाहता है, लेकिन अमेरिकी नागरिकों को मिलने वाली सारी सुविधाएं और लाभ नहीं देना चाहता। उन्होंने कहा कि अन्याय का विरोध करने के लिए हमसे जो कुछ संभव होगा, हम करेंगे।कोलंबिया नदी के किनारे हुए समारोह में ओरेगन ही नहीं वाशिंगटन राज्य, कैलिफोर्निया और यहां तक कि कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया से भी भाग लेने के लिए सैकड़ों भारतीय पहुंचे हुए थे। इस समारोह का आयोजन उस भवन के बराबर में बने पार्क में किया गया, जहां 105 साल पहले गदर पार्टी की स्थापना बैठक हुई थी। इस दौरान भांगड़ा और मार्शल आर्ट का भी प्रदर्शन किया गया।एस्टोरिया से गदर पार्टी का संबंध कुछ साल पहले स्थानीय इतिहासकार योहाना आग्डेन ने अपने शोध के दौरान ढूंढा था। उन्होंने इस बारे में एस्टोरिया सिटी काउंसिल को लिखा, जिसके बाद 2013 में इसकी स्थापना के 100 साल पूरे होने पर एक पार्क में इसका मेमोरियल फलक स्थापित किया गया था।
अमेरिका से आजादी की अलख:-सन 1910 में ओरेगन के एस्टोरिया शहर में 74 भारतीय रहते थे। इनमें ज्यादातर पंजाब से गए सिख थे और वहां पर एक कंपनी में मजदूर का काम करते थे। लाला हरदयाल ने इन भारतीयों को संगठित किया। इसके बाद 23 अप्रैल, 2013 को एस्टोरिया में गदर पार्टी की स्थापना की गई। इसका संस्थापक अध्यक्ष सरदार सोहन सिंह भाकना को बनाया गया। इस पार्टी ने हिंदुस्तान गदर नाम से अखबार निकालकर विदेश में बसे भारतीयों को भेजना शुरू किया। पहले विश्वयुद्ध के समय इस पार्टी ने जर्मनी की मदद से अफगानिस्तान के काबुल में निर्वासित आजाद भारत सरकार की स्थापना की और अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का एलान कर दिया। अंग्रेजों ने हालांकि साथी देशों की मदद से आंदोलन को कुचल दिया। लेकिन, भारतीयों को आजादी की लंबी लड़ाई के लिए तैयार करने में इस पार्टी का अहम योगदान माना जाता है।

नई दिल्‍ली। आपको जानकर हैरत होगी कि दुनिया भर में एक करोड़ लोग ऐसे हैं जिन्‍हें किसी देश की नागरिकता नहीं है। यह आंकड़ा और किसी का नहीं बल्कि संयुक्‍त राष्‍ट्र मानवाधिकार संस्‍था का है। यही वजह है कि इन लोगों को मौलिक अधिकार भी प्राप्‍त नही हैं। म्‍यांमार का रखाइन इलाका भी इसी श्रेणी में आता है। यहां पर मौजूदा कानून की बदौलत करीब दस लाख लोगों को नागरिकता नहीं है। इन्‍हें न तो शिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, नौकरी, शादी करने, बैंक अकांउट खोलने और घर खरीदने तक का अधिकार नहीं है।
कौन होते हैं ये लोग;-इसमें आगे बढ़ने से पहले यह जानना बेहद जरूरी है कि आखिर ये नागरिकता विहीन लोग होते कौन हैं। तो आपको बता दें कि जिन लोगों को कोई भी देश अपना नागरिक मानने से इंकार करता है ऐसे लोग इसी श्रेणी में आते हैं। इन्‍हें उस देश के मौलिक अधिकार भी प्राप्‍त नहीं होते हैं। अब बात आती है कि ऐसा क्‍यों। तो आपको बता दें कि कुछ देशों के संविधान और कानून के चलते नागरिकता देने में बाधा आती है। इसकी वजह कुछ लोगों को अपने देश का नागरिक न मानने के लिए कोई अमुक देश बाधित होता है। जैसा की म्‍यांमार के रखाइन में दिखाई देता है। इसके अलावा कुछ लोग जन्‍म से ही इसके शिकार हो जाते हैं तो कुछ मजबूरी में इस श्रेणी में आ जाते हैं। इनमें वे लोग होते हैं जो आतंकवाद, भुखमरी या युद्ध की आग से बचने के लिए दूसरे देशों में छिपकर शरण लेते हैं।
थाइलैंड में हजारों लोगों को नहीं मिली नागरिकता;-इसी तरह के हजारों लोगों म्यांमार की सीमा से सटे थाइलैंड के पहाड़ी क्षेत्रों में भी मौजूद हैं। यह वही क्षेत्र है जहां पिछले दिनों स्कूली टीम के 12 खिलाड़ी और उनके एक कोच गुफा में फंसे थे। ऐसे लोगों के पास यहां के बुनियादी अधिकार भी नहीं है। अफसोस की बात ये है कि इन लोगों का मामला भी गुफा में फंसे बच्‍चों की वजह से ही सामने आया है। दरअसल, गुफा की त्रासदी से मुक्त हुए बच्चों में से चार भी ऐसे ही समुदाय से आते हैं, जिन्‍हें न तो थाईलैंड की नागरिकता हासिल है और न ही वहां के बुनियादी अधिकार। ऐसे में जब बचाए गए बच्चों को दक्षिण पूर्वी एशियाई देश में राष्ट्रीय संपत्ति के रूप में देखा जा रहा है, तो ध्यान देने योग्य बात है कि उनमें से चार तकनीकी रूप से किसी देश के नागरिक नहीं हैं। इनमें से दो नागरिकता पाने की कगार पर हैं।
थाईलैंड में करीब 5 लाख लोगों को नहीं नागरिकता:-इस मामले के उजागर होने के बाद थाइलैंड में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के कमिश्नर तुआंजाइ डीटेस ने कहा कि इसे निश्चित रूप से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाए जाने की जरूरत है। अभी भी बड़ी संख्या में लोग कहीं के भी नागरिक नहीं हैं।’ अधिकृत आंकड़ों के मुताबिक, थाई सरकार के पास 486,440 लोग स्टेटलेस (नागरिक नहीं होने) के रूप में दर्ज हैं। इनमें से 146,269 लोग 18 वर्ष से कम उम्र के हैं। कई ऐसे समूह हैं जिनके लोग पीढ़ियों से क्षेत्र में घूमते रहे हैं। वे लोग दक्षिणी चीन, म्यांमार और लाओस और उत्तरी थाइलैंड के बीच सुदूर पहाड़ी में खुली सीमा के पार जाते रहे हैं।
कुछ ऐसा है गोल्डन ट्रैंगल:-चियांग राय में उत्तरी थाइलैंड की पट्टी (थाइलैंड, म्यांमार और लाओस के संधि स्थल) को गोल्डन ट्रैंगल कहा जाता है। यह इलाका मादक पदार्थो की तस्करी और गैरकानूनी आव्रजकों का प्रवेश मार्ग रहा है। थाइलैंड की अच्छी आर्थिक स्थिति ने सीमा पार के लोगों को भी आकर्षित किया है। थाइलैंड में उन्हें बुनियादी शिक्षा का पात्र तो माना जाता है, लेकिन उनकी यात्रा पर प्रतिबंध है। इसके साथ ही उन्हें वित्तीय संस्थाओं से दूर रखा जाता है। वे न तो शादी कर सकते हैं और न ही संपत्ति खरीद सकते हैं।
संयुक्‍त राष्‍ट्र की पहल:-आपको यहां पर ये भी बता दें कि वर्ष 2011 में संयुक्त राष्ट्र ने ऐसे राष्ट्रीयता विहीन लोगों की संख्‍या 1.2 करोड़ बताई थी। सोवियत महासंघ के खंडित होने के बाद ऐसे लोगों की संख्‍या में इजाफा हुआ था। वर्ष 2011 में ही संयुक्त राष्ट्र ने अब राष्ट्रीयता विहीन लोगों के साथ हो रहे भेदभाव को उजागर करने के लिए एक वैश्विक अभियान की शुरुआत की थी। इसके तहत ऐसे लोगों की पहचान कर उनको नागरिकता दिलाने की पहल करनी थी। यहां आपको ये भी बता दें कि यूएनएचसीआर द्वारा तैयार किए गए एक मसौदे पर 1961 में इसके 193 सदस्य देशों में से 38 ने ही इस पर हस्‍ताक्षर किए थे।
भारत को लेकर दिलचस्‍प बात:-भारत को लेकर भी यहां पर एक बेहद दिलचस्‍प आंकड़ा सभी के सामने हैं। वर्ष 2015 में मौजूदा मोदी सरकार ने बांग्‍लादेश के साथ एक समझौते पर हस्‍ताक्षर कर 41 वर्षों से दोनों देशों के बीच अटके भूमि सीमा समझौते पर अंतिम मुहर लगाई थी। इस समझौते से पहले दोनों देशों की सीमा पर मौजूद लोगों को किसी देश की नागरिकता नहीं थी। समझौते के बाद करीब 50 हजार लोगों को भारतीय नागरिकता मिल गई। इन लोगों के पास न कहीं का राशन कार्ड था, न वोटर आइडी, न पासपोर्ट, न शिक्षा या स्वास्थ्य की सुविधा। एक समझौते के बाद यह सब बदल गया।
दो देशों की नागरिकता:-इससे उलट भारत-म्‍यांमार सीमा पर एक ऐसा गांव भी है जिन्‍हें दोनों देशों की नागरिकता मिली हुई है। देश के उत्तर-पूर्व सीमा पर स्थित नगालैंड राज्य के मोन जिले में स्थित लोंगवा गांव के लोग इसी श्रेणी में आते हैं। इस गांव से जुड़ी सबसे रोचक बात यह है कि यह गांव अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा में आधा भारत में और आधा म्यांमार में बसा है।

नई दिल्‍ली। फीफा वर्ल्‍ड कप के फाइनल मैच में भले ही क्रोएशिया की टीम को फ्रांस के हाथों हार मिली हो, लेकिन इसके बाद भी वह मैदान में लोगों का दिल जीतने में कामयाब रही। क्रोएशिया की टीम के अलावा टीम की जिस फैन पर दर्शकों की सबसे अधिका निगाह रही वह थी वहां की राष्‍ट्रपति ग्रेबर किट्रोविक। फीफा के फाइनल मैच को देखने के लिए ग्रेबर दर्शकों से भरे स्‍टेडियम में किसी सामान्‍य फैंस की तरह ही मौजूद थीं। इस दौरान उन्हें वहां पर क्रोएशिया की टीम का उत्‍साह बढ़ाते सभी ने देखा।
नहीं मिस किया कोई मैच;-जहां तक उनके फीफा वर्ल्‍ड कप का सवाल है तो उन्‍होंने क्रोएशिया का कोई भी मैच मिस नहीं किया। उनकी सादगी को इस बात से भी आंका जा सकता है कि इसके लिए उन्‍होंने इकॉनमी क्‍लास में ट्रेवल किया और स्‍टेडियम पर भी अपने भारी-भरकम लाव-लश्‍कर के साथ न दिखाई देकर आम फैंस की तरह वहां मौजूद रहीं।इतना ही नहीं उन्‍होंने इस दिन काम न करने की वजह से अपनी उस दिन की तनख्‍वाह तक नहीं ली। फीफा के फाइनल मैच में भी क्रोएशिया की हार के बाद ग्रेबर पुतिन और फ्रांस के राष्‍ट्रपति मैक्रान के साथ मैदान पर उतरी और दर्शकों का अभिवादन स्‍वीकार किया। उस वक्‍त भी उनके चेहरे पर मैच में हार की शिकन तक दिखाई नहीं दे रही थी।
ग्रेबर की सादगी का हर कोई हो गया फैन:-इतना ही नहीं प्राइज डिस्‍ट्रीब्‍यूशन के दौरान भी उन्‍होंने अपने टीम के सभी खिलाडि़यों का गले लगाकर न सिर्फ अभिवादन किया बल्कि उनका हौंसला भी बढ़ाया। यह नजारा दर्शकों से खचाखच भरे स्‍टेडियम में हर किसी ने देखा। इस दौरान आई तेज बारिश में भी ग्रेबर बिना छाते के सभी अहम लोगों के बीच बिना छाते के दिखाई दीं। उनकी यह सादगी स्‍टेडियम में हर किसी को काफी पसंद आई।
ये है उनकी खासियत:-उनका जिक्र हम यहां पर इसलिए भी कर रहे हैं क्‍योंकि बेहद कम लोग उनके बारे में जानते हैं। आपको बता दें कि ग्रेबर क्रोएशियन लैंग्‍वेज के साथ-साथ धारा प्रवाह के साथ अंग्रेजी भी बोलती हैं। इसके अलावा उन्‍हें स्‍पेनिश, पुर्तगाली भाषा भी आती है। इसके अलावा वह जर्मन, फ्रेंच और इतालवी जुबान भी समझ लेती हैं।29 अप्रेल 1968 में युगोस्‍लाविया के इलाके क्रोएशिया में पैदा हुई ग्रेबर किट्रोविक ने वियना हावर्ड और वाशिंगटन डीसी अपनी पढ़ाई की है। इसके अलावा उन्‍होंने क्रोएशिया से तीन वर्ष पहले अपनी डॉक्‍ट्रेट भी पूरी की है।
उन्‍हें मॉडल समझने की भूल कर बैठते हैं लोग:-उन्‍हें न जानने वाले लोग उन्‍हें कई बार मॉडल समझने की भूल भी कर बैठते हैं। फरवरी 2015 में उन्‍होंने क्रोएशिया की पहली महिला राष्‍ट्रपति बनकर इतिहास रच दिया था। वह यहां की चौथी राष्‍ट्रपति हैं। 1993 में क्रोएशिशन डेमोक्रेटिक यूनियन में शामिल होने के बाद से ही वह कई अहम पदों पर काम कर चुकी हैं।वह क्रोएशिया के विदेश मंत्रालय में एडवाइजर की भी भूमिका निभा चुकी हैं। वाशिंगटन डीसी से स्‍वदेश वापसी के बाद उन्‍होंने सांसद के तौर पर अहम भूमिका निभाई थी। आपको बता दें कि राष्‍ट्रपति बनने से पहले ग्रेबर अमेरिका में क्रोएशिया की राजदूत रह चुकी हैं। इसके अलावा वह नाटो में असिसटेंट सेक्रेट्री जनरल के पद पर भी काम कर चुकी हैं।
ग्रेबर के साथ जब जुड़ा विवाद:-1996 में ग्रेबर की शादी जाकोव किट्रोविक के साथ हुई थी। उनके दो बच्‍चे हैं जिनमें से एक बेटी कटरीना स्‍केट्स की जूनियर नेशनल चैंपियन है। 2003 में उन्‍होंने बेटे को जन्‍म दिया जिसका नाम लूका है। वर्ष 2010 में जब ग्रेबर अमेरिका में क्रोएशिया के राजदूत के तौर पर काम कर रही थीं तब उनके पति एक विवाद में भी फंस गए थे।दरअसल वह अपने निजी काम के लिए उनकी सरकारी गाड़ी ले गए थे जिसके चलते काफी विवाद हुआ था। हालांकि बाद में विवाद बढ़ता देख ग्रेबर ने उसका पूरा खर्च सरकार को अदा किया था। इसके बाद यह मामला पूरी तरह से शांत हो गया था।

तेल अवीव। इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने ईरान के परमाणु कार्यक्रमों के दस्तावेज रात के अंधेर में छह घंटे से ज्यादा समय तक चले अॉपरेशन के बाद गायब कर दिेए थे।एक साल तक गोदाम की निगरानी करने के बाद इजरायल को यह पता लग गया था कि ईरानी गार्ड सुबह की शिफ्ट में 7 बजे आते हैं। ऐसे में एजेंटों को स्पष्ट आदेश दिए गए थे कि वे सुबह 5 बजे तक किसी भी कीमत पर गोदाम से निकल जाएं ताकि उनके पास भागने के लिए पर्याप्त समय रहे, क्योंकि एक बार ईरानी अधिकारियों के गोदाम में पहुंचने के बाद यह पता लग जाएगा कि किसी ने देश के गुप्त न्यूक्लियर आर्काइव को चुरा लिया है, जिसमें परमाणु हथियारों पर किए गए काम, उसके डिजाइन और प्रॉडक्शन प्लान के बारे में सालों का लेखा-जोखा है।
पहले ही लिखी जा चुकी थी स्क्रिप्ट:-मोसाद को पता था कि तेहरान में मौजूद गोदाम में घुसने से पहले अलार्म को निष्क्रिय करने, दो दरवाजों को पार करने और दर्जन भर तिजोरियों के ताले तोड़कर उनमें मौजूद खुफिया दस्तावेज निकालने में उन्हें कितना समय लगेगा। यह सब करने में उन्हें कुल 6 घंटे 29 मिनट का समय लगा। हर कदम की स्क्रिप्ट पहले ही लिखी जा चुकी थी।
तोड़नी थी 32 तिजोरियां:-इस साल 31 जनवरी की रात इजरायली एजेंट टॉर्च के साथ गोदाम में पहुंचे। ये टॉर्च 3600 डिग्री पर जल रहे थे। ऑपरेशन की प्लानिंग के दौरान ही एजेंटों को पता था कि उन्हें 32 ईरानी तिजोरियां तोड़नी हैं लेकिन उन्होंने कई को छुआ तक नहीं और सबसे पहले उस तिजोरी को तोड़ा जिसमें सबसे महत्वपूर्ण डिजाइन थे। समय पूरा होते ही ये एजेंट सीमा की तरफ भागे और अपने साथ 50 हजार पन्ने, 163 मेमोज वाली कॉम्पैक्ट डिस्क, वीडियो और प्लान ले गए।
ट्रंप को अप्रैल में दी गई जानकारी:-अप्रैल के आखिर में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने व्हाइट हाऊस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जानकारी देने के बाद इस चोरी से हासिल दस्तावेजों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह एक और कारण है जिसकी वजह से ट्रंप को साल 2015 में हुए ईरान परमाणु समझौते से बाहर हो जाना चाहिए। दस्तावेजों से ईरान की धोखाधड़ी और उसके दोबारा बम बनाने का इरादा साफतौर पर दुनिया के सामने है। कुछ दिन बाद, ट्रंप ने ईरान समझौते से अलग होने का ऐलान कर दिया। यह एक ऐसा कदम था जिसके बाद अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के रिश्तों में भी तनाव आ गया।
परमाणु बम बना रहा ईरान:-बीते हफ्ते, इजरायली सरकार के न्यौते पर तीन रिपोर्टरों ने यह दस्तावेज देखे, इनमें से एक न्यू यॉर्क टाइम्स का रिपोर्टर भी था। इन दस्तावेजों से स्पष्ट है कि भले ही ईरान यह कहता आया हो कि वह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु कार्यक्रम पर काम कर रहा है लेकिन यह देश काफी समय से परमाणु बम बनाने की दिशा में काम कर रहा है।
पंद्रह साल पुराने हैं दस्तावेज:-न्यूक्लियर इंजिनियर और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के पूर्व इंस्पेक्टर रॉबर्ट केली ने कुछ दस्तावेजों को देखने के बाद कहा, 'इन दस्तावेजों से यह साफ पता लगता है कि ये लोग परमाणु बम बनाने के लिए काम कर रहे हैं।' अभी तक इन दस्तावेजों की सत्यता की पुष्टि नहीं की जा सकी है। इनमें से कई दस्तावेज तो 15 साल तक पुराने हैं। इजरायलियों ने यह दस्तावेज रिपोर्टरों को दिखाते समय यह भी कहा कि कुछ पन्ने इसलिए सार्वजनिक नहीं किए जा रहे हैं ताकि किसी और के पास परमाणु हथियार बनाने से संबंधित जानकारी न पहुंचे।
ईरान ने चोरी की कहानी को फर्जी बताया:-उधर, ईरान का कहना है कि यह पूरी कहानी फर्जी है। कुछ ईरानियों के मुताबिक, यह सबकुछ इजरायल जानबूझकर कर रहा है जिससे उनके देश पर दोबारा प्रतिबंध लगा दिए जाए। हालांकि अमेरिकी और ब्रिटिश खुफिया अधिकारियों ने इन दस्तावेजों को देखने और कुछ पुराने दस्तावेजों से तुलना करने के बाद माना है कि ये असली डॉक्युमेंट्स हैं।

बैंकॉक। थाइलैंड की गुफा से 12 बच्चों और उनके फुटबॉल कोच को बचाने में मदद करने वाले ब्रिटिश गुफा विशेषज्ञ वेरनॉन अन्सवर्थ स्पेस एक्स के मालिक एलन मस्क के खिलाफ कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं। मस्क ने एक ट्वीट में वेरनॉन को बाल यौन रोगी बताया था।कार कंपनी टेस्ला के सीईओ मस्क ने पानी से भरी गुफा से बच्चों को निकालने के लिए एक छोटी पनडुब्बी देने की पेशकश की…
जॉर्जिया। जॉर्जिया में एक अजीबोगरीब घटना सामने आई है। यहां दो महिला पुलिस अधिकारियों ने सिक्का उछालने के बाद एक दोषी महिला को गिरफ्तार किया। इस घटना के बाद दोनों महिला अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया गया है। जार्जिया पुलिस के बयान और जारी किए गए वीडियो के मुताबिक यह घटना अप्रैल महीने की है। दोषी महिला सारा वेबर नियमों का उल्लंघन कर गीली सड़क पर 80 मील प्रति घंटे…
काबुल। वर्ष 2018 के पहले छह महीनों में अफगानिस्तान में जारी संघर्ष और आतंकी हमलों में रिकॉर्ड 1,692 आम नागरिकों की मौत हुई है। इन हमलों में 3,430 नागरिक घायल हुए। अफगानिस्तान में कार्यरत संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (यूएनएएमए) ने रविवार को ये ताजा आंकड़े जारी किए हैं।संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन ने जारी किए ताजा आंकड़े:-शिन्हुआ न्यूज एजेंसी ने यूएनएएमए के हवाले से बताया कि ये आंकड़े इस साल एक…
लंदन। आठ साल के भारतवंशी छात्र ईश्वर शर्मा को यंग अचीवर श्रेणी में 'ब्रिटिश इंडियन ऑफ द ईयर' के खिताब से नवाजा गया है। ब्रिटेन में अंडर-11 श्रेणी के राष्ट्रीय योग चैंपियन ईश्वर को इस हफ्ते बर्मिंघम में आयोजित एक कार्यक्रम में यह सम्मान दिया गया।नन्हे चैंपियन ईश्वर ने कलात्मक योग में कई खिताब अपने नाम किए हैं। गत जून में कनाडा में आयोजित व‌र्ल्ड स्टूडेंट गेम्स, 2018 में उन्होंने…
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नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

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