- योगेश कुमार गोयल
देशभर में लोकसभा चुनाव को लेकर माहौल पूरी तरह गर्म हो चुका है, तमाम छोटे-बड़े राजनीतिक दलों ने महासमर जीतने के लिए अपनी सारी ताकत झोंक दी है। चुनाव चाहे छोटे स्तर पर हो या फिर लोकसभा जैसे बड़े स्तर का, प्रत्येक चुनाव में साम, दाम, दंड, भेद हर प्रकार के हथकंडे अपनाते हुए चुनाव जीतने के लिए पैसा पानी की तरह बहाया जाता रहा है। यही वजह है कि हमारे यहां हर चुनाव में बहुत बड़ी धनराशि चुनाव प्रक्रिया पर ही खर्च हो जाती है। आंकड़ों पर नजर डालें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में करीब 5 अरब डॉलर अर्थात् 35 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया था। विधानसभा चुनावों के मामले में खर्चीले चुनाव की बात करें तो कर्नाटक का पिछला विधानसभा चुनाव राजनीतिक दलों द्वारा खर्च किए गए धन के मामले में अब तक का देश में सबसे महंगा विधानसभा चुनाव रहा, जहां 9.5-10.5 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया था, जो कर्नाटक के उससे पहले के चुनावी खर्च से दोगुना था।
जहां तक इस बार के लोकसभा चुनाव में खर्च की बात है तो चुनाव आयोग ने हालांकि प्रति उम्मीदवार अधिकतम 70 लाख रुपये खर्च की सीमा निर्धारित की है लेकिन सभी राजनीतिक दल अपनी ब्रांडिंग से लेकर विज्ञापन तक पर जिस प्रकार भारी-भरकम धनराशि खर्च करते हैं, उससे जाहिर है कि इस तरह के नियम सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं और चुनाव आयोग भी इस तथ्य से अपरिचित नहीं है। इस तथ्य से भी हर कोई भली-भांति परिचित है कि सभी राजनीतिक दर्लआैर उम्मीदवार पैसा जुटाने तथा चुनाव में बहाने के तमाम तरह के वैध-अवैध तरीके अपनाते हुए निर्धारित सीमा से कई गुना ज्यादा खर्च करते हैं और चुनाव आयोग को इस खर्च का एक छोटा सा हिस्सा कुल खर्च के रूप में थमा दिया जाता है। कड़वी हकीकत यही है कि तमाम राजनीतिक दलों और उनके प्रत्याशियों को मिलने वाली आर्थिक मदद और दानदाताओं का सही-सही पता लगाना बेहद मुश्किल होता है क्योंकि भारी-भरकम चंदा देने वाले गिने-चुने लोग ही ऐसे होते हैं, जो अपनी पहचान उजागर करने देने के लिए सहमत होते हैं। दरअसल हर चुनाव में काले धन की बहुत बड़ी खेप खपायी जाती है। इसलिए खर्च का वास्तविक आंकड़ा जुटा पाना बेहद कठिन है। यही वजह है कि कई दशकों से हर चुनाव से पहले चुनाव सुधार की बातें तो जोर-शोर से होती रही हैं किन्तु कोई भी राजनीतिक दल इसे लेकर रत्ती भर भी संजीदा नहीं रहा और यही कारण भारत में चुनावी प्रक्रिया साल दर साल अत्यधिक महंगी होती जा रही है।
कुछ संस्थाओं द्वारा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बार के चुनावी महासमर में पिछले चुनाव से दोगुना खर्च हो सकता है और अगर ऐसा हुआ तो खर्च के मामले में यह चुनाव दुनिया की तमाम चुनावी प्रक्रियाओं को पीछे छोड़ देगा तथा दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास का भी सबसे महंगा चुनाव साबित होगा। 2016 में दुनिया के सबसे विकसित और सम्पन्न देश अमेरिका में हुए राष्ट्रपति तथा कांग्रेस चुनावों में करीब 6.5 अरब अमेरिकी डॉलर अर्थात् 46 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा खर्च होने का अनुमान था। चुनावी खर्च पर नजरें रखने वाली अमेरिकी संस्था ‘कार्नेगीएंडोमेंटफॉर इंटरनेशनल पीस थिंक-टैंक’ के आंकड़ों पर भरोसा करें तो इसका कहना है कि भारत में 2019 का आम चुनाव दुनिया का सबसे महंगा चुनाव साबित होने वाला है। संस्था में साउथ एशिया प्रोग्राम के निदेशक मिलन वैष्णव के अनुसार इस बार चुनाव में 70 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा खर्च होने का अनुमान है। उनके अनुमानित आंकड़ों पर भरोसा इसलिए भी किया जा रहा है क्योंकि वह दुनिया के जाने-माने चुनाव खर्च विशेषज्ञों में शुमार हैं और पिछले कई वर्षों से भारत में चुनावी खर्चों की प्रामाणिक आवाज भी रहे हैं।
दूसरी ओर, सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमसी) ने चुनावी महासमर में इस बार 50 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया है। सीएमसी के अनुसार 1996 के लोकसभा चुनाव में ढ़ाई हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे और 2009 के चुनाव में यह आंकड़ा दस हजार करोड़ तक पहुंच गया था। संस्था के चेयरमैन एन भास्कर राव ने चुनावी खर्च बढ़ने के लिए प्रमुख रूप से सोशल मीडिया, यातायात, विज्ञापन इत्यादि के खर्चों में हुई बढ़ोतरी को जिम्मेदार माना है। अनुमान है कि पिछले लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया पर खर्च करीब 250 करोड़ रुपये रहा था, जो इस बार 5000 करोड़ रुपये हो सकता है। संस्था का कहना है कि लोकसभा चुनाव में होने वाले कुल खर्च का एक चौथाई हिस्सा अनाधिकृत रूप से और मतदाताओं को विभिन्न दलों द्वारा प्रलोभन के रूप में खर्च होगा। दरअसल चुनाव के दौरान आयोजित की जाने वाली रैलियों में प्रत्येक राजनीतिक दल या उम्मीदवार ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाकर शक्ति प्रदर्शन करने के लिए लोगों को रैली का हिस्सा बनने के लिए प्रलोभन की राजनीति का सहारा लेते रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में चुनाव अधिकारियों द्वारा विभिन्न प्रत्याशियों तथा उनके समर्थकों के पास से 4.2 करोड़ डॉलर जब्त किए थे, जिनमें वोट खरीदने के लिए भी धनराशि शामिल थी। यही नहीं, चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली 1.6 करोड़ लीटर शराब तथा 17 हजार किलोग्राम अवैध ड्रग्स भी जब्त की गई थी।
अब वो दिन लद गए, जब बामुश्किल अपने परिवार की रोजी-रोटी का इंतजाम करने वाले लोग भी अपनी ईमानदारी के बूते पर चुनाव जीतकर मिसाल बनते थे। आज तो हालात यह हैं कि किसी ग्राम पंचायत में सरपंच जैसे पद के लिए भी उम्मीदवार एक-एक करोड़ रुपये तक की धनराशि पानी की तरह बहा देते हैं। वहीं नगर निगम चुनावों में 3-5 करोड़ और विधानसभा चुनावों में 15 करोड़ तक का खर्च आम बात हो गई है जबकि राज्यसभा का हिस्सा बनने के लिए 100-200 करोड़ तक खर्च करने की बातें पिछले कुछ समय में अक्सर सुनी गई हैं। इतना पैसा बहाकर सत्ता के पायदानों तक पहुंचने वाले लोगों से ईमानदारी के व्यवहार की उम्मीदें बांधना भला कितना तर्कसंगत होगा। चुनावी प्रक्रिया में धन-बल के बढ़ते इस्तेमाल की इससे बड़ी विड़म्बनात्मक तस्वीर और क्या होगी कि जिस देश में 60 फीसदी आबादी प्रतिदिन करीब दो सौ रुपये आमदनी में अपना गुजारा करने को मजबूर है, वहां आम चुनाव में प्रति मतदाता इससे करीब तीन गुना खर्च हो रहा है। देश में करीब 30 करोड़ लोग तो ऐसे हैं, जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती।
अगर भारत और अमेरिका के चुनावी खर्च के साथ-साथ दोनों देशों की अर्थव्यवस्था का भी तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था भारत के मुकाबले कई गुना बड़ी है। इसलिए भारत की चुनावी प्रक्रिया का अमेरिका जैसे दुनिया के सबसे विकसित देश से भी महंगा हो जाना और साल दर साल बढ़ता चुनावी खर्च देश के हर जिम्मेदार नागरिक के लिए गहन चिंता का विषय होना चाहिए। चुनाव सुधार और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की बातें तो कमोवेश हर राजनीतिक दल द्वारा बढ़-चढ़कर की जाती रही हैं किन्तु कटु सत्य यही है कि व्यवस्था में बदलाव के लिए तैयार कोई भी राजनीतिक दल नहीं है क्योंकि इससे सबके अपने-अपने स्वार्थ जुड़े हैं। चुनावों में हवाला कारोबार के जरिये पैसा आना, कॉरपोरेटफंडिंग इत्यादि कोई नई बात नहीं है। इसलिए राजनीतिक दलों के भरोसे देश में चुनाव सुधार की उम्मीद करना बेमानी है, अब देश की जनता जनार्दन को ही इसके लिए एक बड़े जन-आन्दोलन के लिए तैयार होना होगा, तभी चुनाव सुधार की कल्पना को मूर्त रूप दिया जाना संभव हो सकेगा।
*(लेखक योगेश कुमार गोयल वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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