- योगेश कुमार गोयल*
पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा के शर्मनाक दौर में कोलकाता विश्वविद्यालय के ईश्वर चंद्र विद्यासागरकॉलेज के प्रांगण के बाहर स्थित ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रतिमा को कुछ लोगों द्वारा जिस प्रकार तोड़ा गया और तोड़ने के पश्चात्वीडियोक्लीपिंग जारी कर इसका आरोप एक-दूसरे पर मढ़ने की घृणित राजनीति की गई, उससे न केवल पश्चिम बंगाल में बल्कि समूचे देश में हर सभ्य नागरिक का सिर शर्म से झुक गया है। पिछले कुछ समय से विरोध प्रदर्शनों के बहाने महापुरूषों की मूर्तियों को निशाना बनाए जाने का जो दौर शुरू हुआ है, वह बेहद शर्मनाक है और कम से कम भारतीय लोकतंत्र में तो इस तरह की घटनाओं की स्वीकार्यता कदापि नहीं सकती। बंगाल में ऋषि तुल्य माने जाते रहे ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति किस राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं ने तोड़ी, यहां सवाल यह नहीं है बल्कि मुख्य प्रश्न यही है कि मावनता एवं समाज की भलाई के लिए अपना समस्त जीवन समर्पित कर देने वाले महापुरूषों के प्रति इस प्रकार के आक्रोश के क्या मायने हैं? ऐसी तालिबानी हरकतें कर हम दुनियाभर में भारत की कैसी छवि गढ़ रहे हैं?
सन् 1820 में पश्चिम बंगाल के घाटल शहर में जन्मे ईश्वर चंद्र विद्यासागर ऐसी महान् शख्सियत थे, जिन्होंने के केवल नारी शिक्षा के लिए जन आन्दोलन खड़ा किया था बल्कि उन्हीं के अनथक प्रयासों तथा दृढ़संकल्प के चलते ही ब्रिटिश शासनकाल में अंग्रेज 26 जुलाई 1856 को विधवा विवाह कानून पारित करने को विवश हुए थे तथा विधवाओं को समाज में नए सिरे से जीवन की शुरूआत कर ससम्मान जीने का अधिकार मिला था। यह कानून पारित होने के तीन माह बाद ही उन्होंने एक 10वर्षीया विधवा कमलादेवी का विवाह प्रतिष्ठित घराने के एक युवक के साथ कराया, जो बंगाल का पहला विधवा विवाह था। उसके बाद उन्होंने अपने इकलौते बेटे नारायण का विवाह भी एक विधवा के साथ ही सम्पन्न कराया था। अंग्रेजों के शासनकाल में ऐसे किसी कॉलेज की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, जिसका संचालन पूर्ण रूप से भारतीयों के ही हाथों में हो और जहां पढ़ाने वाले सभी शिक्षक भी भारतीय ही हों किन्तु ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने सन् 1872 में कोलकाता में विद्यासागरकॉलेज की स्थापना कर यह कारनामा भी कर दिखाया था। यही वजह कॉलेज है, जहां गत दिनों ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रतिमा तोड़ी गई।
देश में किसी महापुरूष, समाज सुधारक या बड़ी शख्सियत की मूर्ति तोड़ने या उस पर कालिख पोतने का यह कोई पहला मामला नहीं है बल्कि कुछ समय से लगातार सामने आ रहे इस प्रकार के मामले यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि हमारे देश में राजनीति का स्तर कितना नीचे गिर रहा है, जहां विरोध के नाम पर प्रतिमाओं को भी नहीं बख्शा जा रहा है। गत वर्ष 25 दिसम्बर को लुधियाना में अकाली दल के दो नेताओं द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की प्रतिमा पर कालिख पोतने और दोनों हाथों को लाल रंग से रंगने का मामला सामने आया था। यह घृणित कारनामा करने वालों का तर्क था कि 1984 में हुए सिख कत्लेआम में राजीव गांधी की अहम भूमिका थी और उन्हीं के इशारे पर ये दंगे हुए थे, इसलिए उन्होंने प्रतिमा पर कालिख पोती और हाथों को लाल रंग से रंगा। सिख दंगे मानवता के इतिहास का ऐसा काला अध्याय हैं, जिनकी सदैव निंदा की जाती रहेगी और 34 साल के बेहद लंबे अंतराल बाद ही सही, गत वर्ष अदालत द्वारा भी अपने फैसले में सिख विरोधी दंगों को मानवता के विरूद्ध अपराध करार दिया जा चुका है, ऐसे में विरोध जताने के नाम पर मूर्ति पर कालिख पोतकर तथा मूर्ति के हाथों को लाल रंग से रंगकर लोगों की भावनाएं भड़काने का औचित्य समझ से परे था। वैसे भी किसी भी शख्सियत से कितना ही विरोधाभास क्यों न रहा हो, उसकी मूर्ति पर कालिख पोतना या मूर्ति को खण्डित करना भारतीय संस्कृति न कभी रही है और न कभी रहेगी किन्तु चिंता की बात है कि कुछ समय से कहीं मूर्तियां तोड़कर तो कहीं साम्प्रदायिक दंगों की ज्वाला भड़काकर असामाजिक व उपद्रवी तत्वों द्वारा देश का माहौल बिगाड़ने की कोशिशें की जा रही हैं।
ऐसे ओछे हथकंडे हमारे सभ्य समाज में अमन-चैन और भाईचारे के लिए खतरा ही बनते हैं, इसलिए सहिष्णु भारतीय समाज में इनका कोई स्थान नहीं हो सकता। ईश्वर चंद्र विद्यासागर की मूर्ति तोड़े जाने और कुछ माह पूर्व राजीव गांधी की प्रतिमा से की गई बदसलूकी की घटना के अलावा यदि पिछले कुछ समय की कुछ अन्य घटनाओं पर भी नजर डालें तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी, डा. भीमरावअम्बेडकर, पेरियार जैसे समाज के कुछ नायकों की मूर्तियों के साथ भी ऐसी ही बदसलूकी के मामले सामने आते रहे हैं। श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन सदैव निष्कलंक रहा, वहीं डा. भीमरावअम्बेडकर संविधान निर्माता होने के साथ-साथ जीवन पर्यन्त दलितों और पिछडों की भलाई के लिए कार्य करते रहे और पेरियार द्रविड़ आन्दोलन के संस्थापक होने के साथ-साथ समाज सुधारक और भारतीय समाज में रूढि़वाद के खिलाफ योगदान के लिए जाने जाते रहे हैं।
पिछले एक-डेढ़ साल के भीतर बिहार साम्प्रदायिक हिंसा की आग में झुलस चुका है, रामनवमी शोभा यात्रा के दौरान पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और बिहार के कई इलाकों में विभिन्न समुदायों के बीच नफरत, तनाव और हिंसा के भयावह दृश्य देखे जा चुके हैं। विभिन्न स्थानों पर संविधान निर्माता डा. भीमरावअम्बेडकर की प्रतिमाएं तोड़ने के कई मामले सामने आ चुके हैं, जिनसे तनाव का माहौल बना रहा। त्रिपुरा में लेनिन, तमिलनाडु में पेरियार, पश्चिम बंगाल में जनसंघ के संस्थापक डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के अलावा देश में सालभर के अंदर जगह-जगह कुछ अन्य शख्सियतों की मूर्तियां तोड़ने अथवा खण्डित करने या मूर्तियों पर कालिख पोतने का जो उन्मादी सिलसिला देखने को मिला है, वह भारतीय लोकतंत्र को शर्मसार कर रहा है। निश्चित रूप से ऐसी घटनाएं भारतीय संस्कृति का अनुसरण करते विश्व जगत में भारत की छवि को धूमिल ही करती है। इस तरह की तालिबानी हरकतों का ‘अनेकता में एकता’ और ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ जैसे मूल्यों और सिद्धांतों पर चलने वाले तथा हर प्रकार की अलग-अलग सोच व विचारों का आदर करने वाले देश में कोई स्थान नहीं हो सकता।
मूर्तियां तोड़ने या कलंकित करने की घटनाएं न तो हमारे लोकतंत्र तथा हमारे संविधान की मूल भावना के अनुरूप हैं और न ही ‘सर्वधर्म समभाव’ तथा ‘सभी सुखी रहें’ की मूल भावना पर टिकी हमारी गौरवमयीबहुलतावादी भारतीय संस्कृति, सभ्यता व परम्पराएं हमें इस तरह की हरकतें करने की अनुमति देती हैं। जिस प्रकार मूर्तियों को खण्डित या कलंकित करने के बहाने देश की आत्मा पर प्रहार करने का घृणित सिलसिला शुरू हुआ है, ऐसे में इसे अक्षम्य अपराध की श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए। ऐसी घटनाओं के पीछे कारण चाहे जो भी रहे हों, कुल मिलाकर ये हमारे शांतिप्रिय देश की सभ्यता और संस्कृति पर ग्रहण लगाने में ही अहम भूमिका निभाते हैं क्योंकि किसी भी मूर्ति को खण्डित करने का अर्थ है देश की सभ्यता को खण्डित करना। आज समूचे देश में जिस प्रकार अपराधिक मानसिकता वाले लोगों में कानून का खौफ खत्म होता दिख रहा है और देश में हिंसा, नफरत तथा विघटन की राजनीति चहुं ओर सिर चढ़कर बोलने लगी है, ऐसे में देश के राजनीतिक नेतृत्व को इस दिशा में गंभीर तथा कड़े कदम उठाने होंगे।
हालांकि अतीत से लेकर अब तक दुनियाभर के कई देशों में मूर्तियां तोड़े जाने के घृणित कृत्यों का लंबा इतिहास रहा है। मुगलकाल में अहमद शाह अब्दाली तथा महमूदगजनवी ने भारत पर हमले करते हुए यहां ढ़ेरों मूर्तियों को ध्वस्त किया, बाबर तथा कई मुगल बादशाहों ने हमारे अनेक मंदिर, स्मारक, मूर्तियां या बुत मिट्टी में मिला दिए और अगर इतिहास में ज्यादा पीछे नहीं भी जाएं तो मार्च 2001 में जब क्रूर तालिबानियों ने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति नजीब से सत्ता छीनते हुए खुद सत्ता पर कब्जा किया था, तब आतंकी सोच के नायक मुल्ला मोहम्मद उमर के आदेश पर वहां के बामियान प्रांत में पहाड़ों में तराशकर बनाई गई विश्व शांति दूत महात्मा बुद्ध की सदियों पुरानी मूर्तियों को तोपों व भारी हथियारों द्वारा ध्वस्त कर दिया गया था, जिसकी समूचे विश्व में भर्त्सना हुई थी। इसी प्रकार जब इराक में क्रूर शासक सद्दाम हुसैन की सत्ता का पतन हुआ था, तब अमेरिकी सेना द्वारा उसकी आदमकद प्रतिमा को ध्वस्त कर दिया गया था। मंगोलिया और तजाकिस्तान में भी इसी प्रकार मूर्तियों को ध्वस्त किया जाता रहा है। जर्मनी, यूक्रेन, रूस तथा पूर्वी यूरोप के कई देशों में तो लेनिन की ही हजारों मूर्तियों को धराशायी कर दिया गया है।
सवाल यह है कि अगर हम भी इस तरह की कट्टरपंथी सोच का अनुसरण करते हुए ऐसी ही तालिबानी हरकतें करने लगें तो दूसरों में और हम में क्या फर्क रह जाएगा? वैसे भी हमारी सभ्यता और संस्कृति हमें ऐसा व्यवहार करने की इजाजत नहीं देती और न ही इन्हें लोकतंत्र की मर्यादाओं के अनुरूप कहा जा सकता है। ऐसी घटनाओं से विभिन्न समुदायों और विचारधारा के लोगों के बीच परस्पर तनाव और टकराव ही पैदा होता है, जिससे प्रायः कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने के साथ-साथ जान-माल का भी भारी नुकसान होता है। लोकतंत्र में विरोधी मानसिकता वालों के साथ भी इस तरह का व्यवहार सर्वथा निंदनीय है और इसकी जितनी भर्त्सना की जाए, कम है। आखिर तालिबानी मानसिकता से प्रेरित इस तरह की हरकतें करके हम अपने समाज और राजनीति को किस दिशा की ओर ले जा रहे हैं?

*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

#114, गली नं. 6, वेस्ट गोपाल नगर, एम. डी. मार्ग, नजफगढ़, नई दिल्ली-110043.
फोन: 9416740584, 9034304041.
ई मेल: mediacaregroup@gmail.com

Share this article

AUTHOR

Editor

हमारे बारे में

नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

ताज़ा ख़बरें