जगदलपुर - विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा के दौरान रथ संचलन प्रारंभ हो गया है। इस विशाल रथ को देखने के लिए ही बड़ी संख्या में सैलानी यहां पहुंचते हैं। मां दंतेश्वरी का छत्र रथ में विराजित करने के बाद परिक्रमा सिरहासार से प्रारंभ हुई। फूल रथ परिक्रमा लगातार छह दिनों तक जारी रहेगा और इसे खींचने के लिए आसपास के गांवों के ग्रामीण बड़ी संख्या में मौजूद रहे।
जोगी बिठाई के दूसरे दिन द्वितीया से फूल रथ परिक्रमा शुरू हो जाती है। बताते हैं कि राजा पुरषोत्तम देव को भगवान जगन्नााथ के आदेशानुसार 16 पहियों वाला रथ भेंट गया था। इसके साथ ही उन्हें रथपति की उपाधि भी मिली थी। इस विशाल रथ के चार पहियों को पहले अलग कर बस्तर में रथयात्रा की शुरूआत की गई थी, जो आज भी गोंचा महापर्व के नाम से चर्चित है। इधर शेष 12 पहियों का रथ बस्तर में करीब 608 साल से दशहरा पर चलाया जा रहा है। 12 पहियों वाले रथ चलाने की उन्हें स्वीकृति मिली थी, परंतु चलाने में असुविधा होने के कारण उस एक रथ को आठ और चार पहियों वाले दो रथों में विभाजित कर दिया गया। ऐसा अनुमान है कि पहले बड़े डोंगर, मधोता, कुरूषपाल और बस्तर आदि स्थानों में दशहरे का रूप कुछ संक्षिप्त रहा होगा। राजधानी जगदलपुर स्थानांतरित होने के बाद ही विस्तृत आयोजन और विशाल रथ को चलाने के लिए गुंजाइश बन सकी होगी। अश्विन शुक्ल द्वितीय से लेकर सप्तमी तक लगातार छह दिनों तक चार पहियों वाला रथ चलाया जाता है।
चार पहियों वाले इस रथ को फूल रथ कहते हैं, चूंकि इस रथ पर आरूढ़ होने वाले राजा के सिर पर फूलों की पगड़ी होता थी। रथ पर छत्र चढ़ाने और पुलिस जवानों द्वारा हर्ष फायर स्वरूप अभिवादन किया जाता है। यह रस्म पूर्ण होने के बाद ही फूल रथ मावली माता मंदिर की परिक्रमा करता है। यह सिरहासार चौक से गोल बाजार चौक, सदर प्राथमिक शाला के सामने से होते हुए गुरु नानक चौक पहुंचता है, फिर वहां से टेकरी वाले हनुमान मंदिर के सामने से होकर सिंहद्वार के पास पहुंच कर रुक जाता है। यह प्रक्रिया लगाता छह दिनों तक जारी रहेगी। यहां छत्र को ससम्मान रथ से उतारकर दंतेश्वरी मंदिर पहुंचा दिया जाता है।
साहित्यकार रूद्रनारायण पाणीग्राही बताते हैं कि फूल रथ जैसे ही भगवान जगन्नाथ मंदिर के सामने पहुंचता है। केंवट, पनारा आदि जाति की सुहागिन महिलाएं भाव विभोर होकर चना-लाई निछावर किया करती हैं। वहीं जब रथ सिंहद्वार के सामने पहुंचता है तो राउरीन महिलाएं आरती उतारती हैं उसके बाद ही मांइजी का छत्र रथ से उतार कर मंदिर में पहुंचाया जाता है।

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