नई दिल्‍ली। अब आप भारत सरकार में सीधे संयुक्त सचिव स्‍तर का अधिकारी बन सकते हैं। इसके लिए आईएएस परीक्षा पास करना जरूरी नहीं है। अलबत्‍ता, इसके लिए आईपीएस, आईआरएस और इंजीनियरिंग सर्विस से होना भी जरूरी नहीं है। बल्कि एक प्राइवेट पर्सन भी भारत सरकार में सीधे ज्‍वाइंट सेक्रेटरी बन सकता है, जिसे बनने में आईएएस करने वाले युवाओं को भी अमूमन 16 साल लग जाते हैं। सुनने में यह अटपटा लग सकता है, लेकिन यह सच है। हम पूर्व वरिष्‍ठ आईएएस अधिकारियों के हवाले से आपको बता रहे हैं कि आखिर सरकार ने ऐसा क्‍यों किया और इसके क्‍या फायदे हैं? अगर ऐसा है तो आईएएस अधिकारी बनने की ख्‍वाहिश रखने वाले लाखों युवा क्‍यों सालों दिन-रात एक करते रहते हैं?शुरुआत हम भारत सरकार द्वारा शुक्रवार यानी 12 अप्रैल को लिए गए फैसले से करते हैं। इस फैसले के तहत सरकार ने एक झटके में विभिन्‍न क्षेत्रों से आने वाले 9 विशेषज्ञों को लेटरल प्रवेश प्रक्रिया (Lateral Entry Process) के जरिए संयुक्‍त सचिव बनाया है। लेटरल प्रवेश प्रक्रिया के जरिए पहली बार इतनी बड़ी संख्या में अलग-अलग मामलों के विशेषज्ञ सरकार में शामिल होंगे।
संयुक्‍त सचिव ही क्‍यों:-प्राइवेट सेक्‍टर से आने वालों को सरकार द्वारा संयुक्‍त सचिव के रूप में इसलिए नियुक्‍त किया जाता है, क्‍योंकि इस पद का मतलब है विशेषज्ञता। यानी संयुक्‍त सचिव बनने वाले अधिकारियों को सरकार एक्‍सपर्ट के तौर पर देखती है। उन्‍हें खास विदेश दौरों पर भेजा जाता है। उन्‍हें स्‍पेशल ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि वे खास तरह के काम को कुशलतापूर्वक अंजाम दे सकें।योग्यता के अनुसार सामान्य ग्रेजुएट और किसी सरकारी, पब्लिक सेक्टर यूनिट, यूनिवर्सिटी के अलावा किसी प्राइवेट कंपनी में 15 साल काम का अनुभव रखने वाले भी संयुक्‍त सचिव पद के योग्‍य हो सकते हैं। वैसे यह मामला बहुत ताजा नहीं है। लंबे समय से सरकारी क्षेत्र के उच्‍च पदों पर प्राइवेट सेक्‍टर के लोगों की भर्ती की मांग उठती आ रही है। इसे देखते हुए नरेंद्र मोदी सरकार ने 2015 में लेटरल एंट्री प्रोसेस में बड़ा संशोधन किया।हालांकि यह प्रोसेस पहले से अस्तित्‍व में था और इसी के तहत पूर्व में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह अहलूवालिया, एनडीटीवी के प्रमुख प्रणय राय, पूर्व आईबीआई गवर्नर बिमल जालान, पूर्व पेट्रोलियम व वित्त सचिव विजय केलकर, पूर्व ऊर्जा सचिव आरवी शाही जैसे लोगों की नियुक्ति की गई।सरकार द्वारा किए गए इस बड़े बदलाव का सबसे बड़ा कारण विभिन्‍न सरकारी महकमों में विशेषज्ञों की कमी बताई जाती है। माना जाता है कि प्राइवेट सेक्‍टर में लंबे अनुभव रखने वालों की सरकारी क्षेत्र में एंट्री से सरकारी कामकाज के तरीके पेशेवर बनेंगे, जिसका फिलहाल अभाव है। भारत के नौकरशाहों की अक्‍सर उनके शाही अंदाज और तौर-तरीकों के लिए आलोचना की जाती है, जिससे सरकारी योजनाओं की क्रियान्‍वयन प्रक्रिया सुस्‍त हो जाती है। इसका नकारात्‍मक असर समाज और देश के विकास पर होता है।

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