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मुंबई (हम हिंदुस्तानी)-नीतू चंद्रा ऐसे असामान्य रास्ता चुनने के लिए जानी जाती है जो उनके व्यक्तित्व को चुनौती देने वाले होते है. वे विभिन्न भूमिकाओं के साथ प्रयोग करने के लिए पहचानी जाती है. उन्होंने कोरियाई युवा एक्शन ड्रामा "नारे" की तैयारी खत्म करते ही अपने अगले प्रोजेक्ट "द वर्स्ट डे" नामक एक लघु फिल्म पर काम शुरू कर दिया है. लॉस एंजेलिस आधारित, कॉमेडी को प्रसिद्ध बल्गेरियाई फिल्म निर्माता स्टानिस्लावा आइवी द्वारा लिखा और निर्देशित किया गया है और इसका निर्माण मारिएटा मेलरोज और वर्जीनिया ब्लैटर ने किया है. नीतू इस लघु फिल्म में अपनी पहली नकारात्मक भूमिका निभाएंगी. चंद्रा कहती हैं, “2019 की शुरुआत मेरे लिए अद्भुत है और मैं इस परियोजना पर काम कर के रोमांचित हूं. यह मेरे लिए सीखने का अनुभव रहा है क्योंकि यह मेरी पहली नकारात्मक भूमिका है. हालाँकि मैं अपने चरित्र के बारे में बहुत कुछ नहीं बता सकता, लेकिन मैं आपको बता सकती हूँ कि वह वाइल्ड है, दिलचस्प है और वह खलनायक है. उसे चित्रित करने के लिए मुझे बदल दिया गया है और यह निश्चित रूप से मेरी सबसे खास परियोजनाओं में से एक है.” "द वर्स्ट डे" के साथ, नीतू हॉलीवुड में अभिनेता मारिएटा मेलरोस ("ग्लोरिया बेल" और "एटिपिकल") और जोस मोरेनो ब्रूक्स ("टेलीनोवेला") के साथ अपनी शुरुआत कर रही है. कहा जाता है कि प्रतिभा आपको जगह देती है और नीतू इसका एक बड़ा उदाहरण है. उनके समर्पण और क्राफ्ट ने दुनिया भर में भाषा की बाधाओं को दूर करते हुए उन्हें भावपूर्ण भूमिकाएं दी हैं. हर बार वो अपनी भूमिक अको एक नई उंचाई देती रही है.


मुंबई (हम हिंदुस्तानी)-अभिनेत्री कियारा आडवाणी जो एक फैशनिस्टा और ट्रेंडसेटर हैं, ने अपने स्मार्ट लगेज कैरीअल के साथ अपनी नई स्टाइल स्टेटमेंट ढूंढ ली हैं. सिर्फ इतना ही नहीं, स्मार्ट और एफिशिएंट कैरिअल रेंज उनका परफेक्ट ट्रैवल पार्टनर बन गया है.
किआरा ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर एक स्टाइलिश वीडियो पोस्ट किया, जहां वह भारत के पहले स्मार्ट लगेज कैरीअल का इस्तेमाल कर रही है. इसमें अन्य विशेषताओं के साथ एक इनबिल्ट वेइंग मशीन है जो आपको बैग का वजन बताती है.
किआरा कहती हैं, "कैरीअल बैग के जरिए मैं जान सकती हूं कि मेरे बैग का वजन कितना है, मैं इससे अपना फोन चार्ज कर सकती हूं और इसका डिजाइन मेरे स्टाइल स्टेटमेंट का हिस्सा बन गया है."
कैरीअल एक प्रीमियम लगेज ब्रांड है. इसका टैगलाइन है "व्हेरएवर योर जर्नी टेक्स यू".
कैरिअल में एक बैकपैक रेंज भी है, जिसे शाहिद कपूर और दिशा पटानी जैसे अभिनेताओं मे प्रमोट किया है.


मुंबई (हम हिंदुस्तानी)-अति शिष्ट अभिनेता अली फज़ल अपने प्रॉजेक्ट्स और रिलीज़ के बीच कुछ महीने व्यस्त रहने के बाद, अब ओटोमन देश में बहुप्रतीक्षित छुट्टियों के लिए तुर्की रवाना हो गए। अली की इस ऐतिहासिक देश की यात्रा की योजना काफी लंबे समय से थी, लेकिन व्यस्तताओं के कारण ऐसा हो नहीं सका था। जैसे ही उनकी आखिरी फिल्म रिलीज़ हुई, वे तुरंत ही खुद को इस छुट्टी का उपहार देने के लिए रवाना हो गए। लेकिन खुद उन्हें भी पता नहीं था कि तुर्की पहुंचने के बाद वे तुर्की के विश्व प्रसिद्ध शेफ और रेस्टॉरटर नुसरत गोकसे यानी सॉल्ट बे से मिलेंगे। साल्ट बे विश्वप्रसिद्ध शेफ्स में से एक है और उनके पास यूएस, यूएई और तुर्की में स्टेक हाउसों की एक श्रृंखला है। मीट तैयार करने और पकाने की उनकी तकनीक ने उन्हें विभिन्न सामाजिक प्लेटफार्मों पर इंटरनेट सनसनी बना दिया है। मीट डिश तैयार करने के बाद, नमक छिड़कने का उनका अपना अलग तरीका है, जिसमें वे उसे अपनी उंगलियों से अपनी अग्र-भुजाओं में गिराते हैं और फिर डिश में, इसी से उनका नाम पड़ा है साल्ट बे। अली जब तुर्की में थे तो वे उनके रेस्तरां में गए जहां खुद साल्ट बे ने उन्हें अटेंड किया। यह देखा गया है कि सॉल्ट बे केवल लोकप्रिय फुटबॉलरों के सामने ही अपना खाना पकाने का कौशल प्रदर्शित करते हैं और अब अरबपति अली फज़ल एकमात्र बॉलीवुड सेलिब्रिटी हैं जिनके लिए उन्होंने ऐसा किया है। विक्टोरिया और अब्दुल जैसी हॉलीवुड फिल्म के साथ अली की बढ़ती लोकप्रियता और अमेज़ॅन प्राइम वीडियो पर मिर्जापुर की सबसे अधिक देखी जाने वाली वीडियो के साथ अंतरराष्ट्रीय दर्शकों की नज़र में अली ने अपनी यह लोकप्रियता निश्चित रूप से हॉल ऑफ फ़ेम ऑफ़ नुसरट गोके उर्फ साल्ट बे रेस्तरां में भी बरकरार रखी है।


- योगेश कुमार गोयल*
गत दिनों भारतीय वायुसेना का एक और मिग विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। दरअसल मिग-27यूपीजी विमान ने उतरलाईवायुसेना अड्डे से उड़ान भरी ही थी कि उसके इंजन में एकाएक खराबी आ गई राजस्थान में जोधपुर के पास दुर्घटना का शिकार हो गया। हालांकि इस हादसे में पायलट बाल-बाल बच गया और सूझबूझ का परिचय देते हुए उसने विमान को घनी आबादी वाले इलाके से दूर जंगल में ले जाकर किसी बड़े हादसे को भी टाल दिया लेकिन मिग-27 के इस हादसे के बाद एक बार फिर मिग विमानों के बार-बार होते हादसों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। इस साल के शुरूआती तीन महीनों में वायुसेना यह 9वां विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ है। जहां तक मिग हादसों की बात है तो पिछले ही महीने 8 मार्च को राजस्थान के बीकानेर जिले में एक मिग-21 दुर्घटना का शिकार हुआ था जबकि फरवरी माह में पाकिस्तान के लड़ाकू विमान एफ-16 को मार गिराये जाने के बाद विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान का मिग-21क्रैश हो गया था। एक के बाद एक लगातार हो रहे मिग हादसों के कारण भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल इन विमानों को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
पांच दशक पुराने इन मिग विमानों को बदलने की मांग लंबे समय से हो रही है किन्तु वायुसेना के लिए लड़ाकू विमानों की कमी के चलते इनकी सेवाएं लेते रहना वायुसेना की मजबूरी रही है। वायुसेना का कहना है कि 2030 तक चरणबद्ध तरीके से मिग विमानों को भी हटाया जाएगा लेकिन सवाल यह है कि क्या तब तक मिग इसी प्रकार दुर्घटनाग्रस्त होते रहेंगे और हम अपने लड़ाकू पायलटों को खोते रहेंगे? ऐसे हादसों में करीब 200 लड़ाकू पायलट मौत के मुंह में समा चुके हैं। भारतीय वायुसेना को 1964 में पहला सुपरसोनिकमिग-21 विमान प्राप्त हुआ था और भारत ने रूस से 872मिग विमान खरीदे थे, जिनमें से अधिकांश क्रैश हो चुके हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1971 से 2012 के बीच 482मिग विमानों की दुर्घटना में 171फाइटरपायलट, 39 आम नागरिक, 8सैन्यकर्मी तथा विमान चालक दल के एक सदस्य की मौत हुई। हालांकि वायुसेना के पास अब जो मिग विमान हैं, उन्हें तकनीकी रूप से उन्नत किया जा चुका है किन्तु फिर भी ये बार-बार दुर्घटना के शिकार हो रहे हैं। केन्द्र सरकार द्वारा मार्च 2016 में संसद में यह जानकारी दी गई थी कि वर्ष 2012 से 2016 के बीच भारतीय वायुसेना के कुल 28 विमान दुर्घटनाग्रस्त हुए, जिनमें एक चौथाई अर्थात् 8मिग-21 विमान थे और इनमें से भी 6मिग-21 विमान ऐसे थे, जिन्हें अपग्रेड कर ‘मिग-21बायसन’ का दर्जा दिया गया था। कुछ समय पहले तक वायुसेना के पास करीब 120मिग21 विमान थे, जिनमें से अधिकांश क्रैश हो गए हैं और फिलहाल केवल 40-45मिग-21 ही बचे हैं। 1960 के दशक में भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल किए गए मिग विमान सोवियत रूस में बने हैं। रूस में निर्मित इन विमानों के निरन्तर दुर्घटनाग्रस्त होते जाने का प्रमुख कारण यही बताया जाता रहा है कि ये विमान रूस की पुरानी तकनीक से निर्मित हैं और अब इनके असली पुर्जे नहीं मिल पाते।
पिछले कुछ ही वर्षों में मिग विमानों की इतनी दुर्घटनाएं हो चुकी हैं कि अब इन्हें वायुसेना के ही कुछ अधिकारी तथा इन विमानों को उड़ाने वाले पायलट ‘फ्लाइंगकॉफिन’ अर्थात् ‘हवा में उड़ने वाला ताबूत’ कहने लगे हैं। हालांकि मिग अपने समय के उच्चकोटि के लड़ाकू विमान रहे हैं लेकिन अब ये विमान इतने पुराने हो चुके हैं कि सामान्य उड़ान के दौरान ही क्रैश हो जाते हैं। करीब एक दशक पहले मिग विमानों को बायसन मानकों के अनुरूप अपग्रेड करना शुरू कर इनमें राडार, दिशासूचक क्षमता इत्यादि बेहतर की गई किन्तु अपग्रेडेशन के बावजूद हकीकत यही है कि इन विमानों की उम्र बहुत पहले ही पूरी हो चुकी है। आज के समय में ऐसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों की जरूरत है, जो छिपकर दुश्मन को चकमा देने, सटीक निशाना साधने, उच्च क्षमता वाले राडार, बेहतरीन हथियार, ज्यादा वजन उठाने की क्षमता इत्यादि सुविधाओं से लैस हों जबकि मिग का न तो इंजन विश्वसनीय है और न ही इनसे सटीक निशाना साधने वाले उन्नत हथियार संचालित हो सकते हैं।
सही मायनों में मिग विमानों को 1990 के दशक में ही सैन्य उपयोग से बाहर कर दिया जाना चाहिए था। दरअसल हर लड़ाकू विमान की एक उम्र होती है और मिग विमानों की उम्र करीब 20 साल पहले ही पूरी हो चुकी है लेकिन हम इन्हें अपग्रेड कर इनकी उम्र बढ़ाने की कोशिश करते रहे हैं और तमाम ऐसी कोशिशों के बावजूद इनकी कार्यप्रणाली प्रायः धोखा देती रही है, जिसका नतीजा मिग विमानों की अक्सर होती दुर्घटनाओं के रूप में बार-बार देखा भी जाता रहा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार अपनी वायुसेना को गंभीरता से लेने वाले देशों में भारत संभवतः आखिरी ऐसा देश है, जो आज भी मिग-21 का इस्तेमाल करता है। रक्षा विशेषज्ञों की मानें तो मिगविमान 1960 व 1970 के दशक की टैक्नोलॉजी के आधार पर निर्मित हुए थे जबकि अब हम 21वीं सदी के भी करीब दो दशक पार कर चुके हैं और पुरानी तकनीक वाले ऐसे मिग विमानों को ढ़ो रहे हैं, जिनका आधुनिक तकनीक से निर्मित लड़ाकू विमानों से कोई मुकाबला नहीं है।
आज स्थिति यह है कि ये विमान अब सामान्य उड़ानों के दौरान भी हादसों के शिकार हो रहे हैं। जहां तक राफेल विमानों की बात है तो इन्हें लेकर कुछ रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि चूंकि ये बेहद उच्चस्तरीय, जटिल तथा परिष्कृत किस्म के विमान हैं जबकि युद्धक मोर्चे पर छोटे, हल्के और सस्ते लड़ाकू विमानों की ज्यादा जरूरत होती है, ऐसे में राफेलमिग विमानों की जगह नहीं ले सकते। हमारी वायुसेना के पास हर प्रकार के लड़ाकू विमानों की काफी कमी है। संसदीय समिति की एक रिपोर्ट के अनुसार वायुसेना के पास लड़ाकू विमानों के केवल 31 दस्ते (स्क्वाड्रन) ही हैं जबकि जरूरत 42 दस्तों की है और नए विमान आने की रफ्तार काफी धीमी है। ऐसे में अगर मिग-21, मिग-27 और मिग-29 विमानों के 14 दस्ते भी परिचालन से बाहर हो जाते हैं तो वायुसेना के पास लड़ाकू विमानों के बहुत कम दस्ते रह जाएंगे। ऐसे में रक्षा सौदों में पारदर्शिता बरतते हुए वायुसेना की इन जरूरतों को जल्द से जल्द पूरा किया जाना वायुसेना को मजबूत बनाए रखने के लिहाज से बेहद जरूरी है।
*(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं)

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- योगेश कुमार गोयल
देशभर में लोकसभा चुनाव को लेकर माहौल पूरी तरह गर्म हो चुका है, तमाम छोटे-बड़े राजनीतिक दलों ने महासमर जीतने के लिए अपनी सारी ताकत झोंक दी है। चुनाव चाहे छोटे स्तर पर हो या फिर लोकसभा जैसे बड़े स्तर का, प्रत्येक चुनाव में साम, दाम, दंड, भेद हर प्रकार के हथकंडे अपनाते हुए चुनाव जीतने के लिए पैसा पानी की तरह बहाया जाता रहा है। यही वजह है कि हमारे यहां हर चुनाव में बहुत बड़ी धनराशि चुनाव प्रक्रिया पर ही खर्च हो जाती है। आंकड़ों पर नजर डालें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में करीब 5 अरब डॉलर अर्थात् 35 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया था। विधानसभा चुनावों के मामले में खर्चीले चुनाव की बात करें तो कर्नाटक का पिछला विधानसभा चुनाव राजनीतिक दलों द्वारा खर्च किए गए धन के मामले में अब तक का देश में सबसे महंगा विधानसभा चुनाव रहा, जहां 9.5-10.5 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया गया था, जो कर्नाटक के उससे पहले के चुनावी खर्च से दोगुना था।
जहां तक इस बार के लोकसभा चुनाव में खर्च की बात है तो चुनाव आयोग ने हालांकि प्रति उम्मीदवार अधिकतम 70 लाख रुपये खर्च की सीमा निर्धारित की है लेकिन सभी राजनीतिक दल अपनी ब्रांडिंग से लेकर विज्ञापन तक पर जिस प्रकार भारी-भरकम धनराशि खर्च करते हैं, उससे जाहिर है कि इस तरह के नियम सिर्फ कागजों तक ही सीमित हैं और चुनाव आयोग भी इस तथ्य से अपरिचित नहीं है। इस तथ्य से भी हर कोई भली-भांति परिचित है कि सभी राजनीतिक दर्लआैर उम्मीदवार पैसा जुटाने तथा चुनाव में बहाने के तमाम तरह के वैध-अवैध तरीके अपनाते हुए निर्धारित सीमा से कई गुना ज्यादा खर्च करते हैं और चुनाव आयोग को इस खर्च का एक छोटा सा हिस्सा कुल खर्च के रूप में थमा दिया जाता है। कड़वी हकीकत यही है कि तमाम राजनीतिक दलों और उनके प्रत्याशियों को मिलने वाली आर्थिक मदद और दानदाताओं का सही-सही पता लगाना बेहद मुश्किल होता है क्योंकि भारी-भरकम चंदा देने वाले गिने-चुने लोग ही ऐसे होते हैं, जो अपनी पहचान उजागर करने देने के लिए सहमत होते हैं। दरअसल हर चुनाव में काले धन की बहुत बड़ी खेप खपायी जाती है। इसलिए खर्च का वास्तविक आंकड़ा जुटा पाना बेहद कठिन है। यही वजह है कि कई दशकों से हर चुनाव से पहले चुनाव सुधार की बातें तो जोर-शोर से होती रही हैं किन्तु कोई भी राजनीतिक दल इसे लेकर रत्ती भर भी संजीदा नहीं रहा और यही कारण भारत में चुनावी प्रक्रिया साल दर साल अत्यधिक महंगी होती जा रही है।
कुछ संस्थाओं द्वारा अनुमान लगाया जा रहा है कि इस बार के चुनावी महासमर में पिछले चुनाव से दोगुना खर्च हो सकता है और अगर ऐसा हुआ तो खर्च के मामले में यह चुनाव दुनिया की तमाम चुनावी प्रक्रियाओं को पीछे छोड़ देगा तथा दुनिया के लोकतांत्रिक इतिहास का भी सबसे महंगा चुनाव साबित होगा। 2016 में दुनिया के सबसे विकसित और सम्पन्न देश अमेरिका में हुए राष्ट्रपति तथा कांग्रेस चुनावों में करीब 6.5 अरब अमेरिकी डॉलर अर्थात् 46 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा खर्च होने का अनुमान था। चुनावी खर्च पर नजरें रखने वाली अमेरिकी संस्था ‘कार्नेगीएंडोमेंटफॉर इंटरनेशनल पीस थिंक-टैंक’ के आंकड़ों पर भरोसा करें तो इसका कहना है कि भारत में 2019 का आम चुनाव दुनिया का सबसे महंगा चुनाव साबित होने वाला है। संस्था में साउथ एशिया प्रोग्राम के निदेशक मिलन वैष्णव के अनुसार इस बार चुनाव में 70 हजार करोड़ रुपये से भी ज्यादा खर्च होने का अनुमान है। उनके अनुमानित आंकड़ों पर भरोसा इसलिए भी किया जा रहा है क्योंकि वह दुनिया के जाने-माने चुनाव खर्च विशेषज्ञों में शुमार हैं और पिछले कई वर्षों से भारत में चुनावी खर्चों की प्रामाणिक आवाज भी रहे हैं।
दूसरी ओर, सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज (सीएमसी) ने चुनावी महासमर में इस बार 50 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान लगाया है। सीएमसी के अनुसार 1996 के लोकसभा चुनाव में ढ़ाई हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे और 2009 के चुनाव में यह आंकड़ा दस हजार करोड़ तक पहुंच गया था। संस्था के चेयरमैन एन भास्कर राव ने चुनावी खर्च बढ़ने के लिए प्रमुख रूप से सोशल मीडिया, यातायात, विज्ञापन इत्यादि के खर्चों में हुई बढ़ोतरी को जिम्मेदार माना है। अनुमान है कि पिछले लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया पर खर्च करीब 250 करोड़ रुपये रहा था, जो इस बार 5000 करोड़ रुपये हो सकता है। संस्था का कहना है कि लोकसभा चुनाव में होने वाले कुल खर्च का एक चौथाई हिस्सा अनाधिकृत रूप से और मतदाताओं को विभिन्न दलों द्वारा प्रलोभन के रूप में खर्च होगा। दरअसल चुनाव के दौरान आयोजित की जाने वाली रैलियों में प्रत्येक राजनीतिक दल या उम्मीदवार ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाकर शक्ति प्रदर्शन करने के लिए लोगों को रैली का हिस्सा बनने के लिए प्रलोभन की राजनीति का सहारा लेते रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में चुनाव अधिकारियों द्वारा विभिन्न प्रत्याशियों तथा उनके समर्थकों के पास से 4.2 करोड़ डॉलर जब्त किए थे, जिनमें वोट खरीदने के लिए भी धनराशि शामिल थी। यही नहीं, चुनाव प्रचार के दौरान मतदाताओं को लुभाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली 1.6 करोड़ लीटर शराब तथा 17 हजार किलोग्राम अवैध ड्रग्स भी जब्त की गई थी।
अब वो दिन लद गए, जब बामुश्किल अपने परिवार की रोजी-रोटी का इंतजाम करने वाले लोग भी अपनी ईमानदारी के बूते पर चुनाव जीतकर मिसाल बनते थे। आज तो हालात यह हैं कि किसी ग्राम पंचायत में सरपंच जैसे पद के लिए भी उम्मीदवार एक-एक करोड़ रुपये तक की धनराशि पानी की तरह बहा देते हैं। वहीं नगर निगम चुनावों में 3-5 करोड़ और विधानसभा चुनावों में 15 करोड़ तक का खर्च आम बात हो गई है जबकि राज्यसभा का हिस्सा बनने के लिए 100-200 करोड़ तक खर्च करने की बातें पिछले कुछ समय में अक्सर सुनी गई हैं। इतना पैसा बहाकर सत्ता के पायदानों तक पहुंचने वाले लोगों से ईमानदारी के व्यवहार की उम्मीदें बांधना भला कितना तर्कसंगत होगा। चुनावी प्रक्रिया में धन-बल के बढ़ते इस्तेमाल की इससे बड़ी विड़म्बनात्मक तस्वीर और क्या होगी कि जिस देश में 60 फीसदी आबादी प्रतिदिन करीब दो सौ रुपये आमदनी में अपना गुजारा करने को मजबूर है, वहां आम चुनाव में प्रति मतदाता इससे करीब तीन गुना खर्च हो रहा है। देश में करीब 30 करोड़ लोग तो ऐसे हैं, जिन्हें दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती।
अगर भारत और अमेरिका के चुनावी खर्च के साथ-साथ दोनों देशों की अर्थव्यवस्था का भी तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो स्पष्ट है कि अमेरिका की अर्थव्यवस्था भारत के मुकाबले कई गुना बड़ी है। इसलिए भारत की चुनावी प्रक्रिया का अमेरिका जैसे दुनिया के सबसे विकसित देश से भी महंगा हो जाना और साल दर साल बढ़ता चुनावी खर्च देश के हर जिम्मेदार नागरिक के लिए गहन चिंता का विषय होना चाहिए। चुनाव सुधार और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की बातें तो कमोवेश हर राजनीतिक दल द्वारा बढ़-चढ़कर की जाती रही हैं किन्तु कटु सत्य यही है कि व्यवस्था में बदलाव के लिए तैयार कोई भी राजनीतिक दल नहीं है क्योंकि इससे सबके अपने-अपने स्वार्थ जुड़े हैं। चुनावों में हवाला कारोबार के जरिये पैसा आना, कॉरपोरेटफंडिंग इत्यादि कोई नई बात नहीं है। इसलिए राजनीतिक दलों के भरोसे देश में चुनाव सुधार की उम्मीद करना बेमानी है, अब देश की जनता जनार्दन को ही इसके लिए एक बड़े जन-आन्दोलन के लिए तैयार होना होगा, तभी चुनाव सुधार की कल्पना को मूर्त रूप दिया जाना संभव हो सकेगा।
*(लेखक योगेश कुमार गोयल वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)

114, गली नं. 6, वेस्ट गोपाल नगर, एम. डी. मार्ग, नजफगढ़, नई दिल्ली-110043.
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-डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
ज्यों ज्यों मतदान के चरण आगे बढ़ते जा रहे हैं सोषियल मीडिया और अधिक सक्रिय होता जा रहा है। मजे की बात यह है कि एक दूसरे को जोड़ने, नजदीक लाने, सूचनाओं के तत्काल आदान-प्रदान का क्रांतिकारी माध्यम सोषियल मीडिया मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा करने का माध्यम बनता जा रहा है। तकनीक के दुरुपयोग का ही परिणाम है कि सत्य से कोसों दूर बातों को सोषियल मीडिया पर इस तरह से परोसा जा रहा है कि सही और झूठ का पता ही नहीं चल पाता। आम मतदाता पूरी तरह से भ्रमित होता जा रहा है। आज चुनाव आयोग भी सोषियल मीडिया के इस तरह के दुरुपयोग से चिंतित है। फेक न्यूज के माध्यम से लोगों को भ्रमित करना आम होता जा रहा है। सोषियल मीडिया के फेक एकाउंट और अंध फोलोवर्स द्वारा सोषियल मीडिया खासतौर से वाट्सएप, ट््िवटर, फेसबुक आदि का इस कदर दुरुपयोग हो रहा है कि सही गलत का पता लगाना आम आदमी के लिए मुष्किल भरा हो रहा है। फोटोषाॅप या दूसरे अन्य तकनीकों से फोटों, पत्रों, वीडियों- आडियों आदि से छेड़छाड़ कर इस तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है कि जब तक सही स्थिति सामने आती है तब तक वह पोस्ट अपना असर डाल चुकी होती है। हालिया कुछ पोस्टे इसका ज्वलंत उदाहरण है जिसमें डाॅ. मुरली मनोहर जोषी का लाल कृृष्ण अड़वानी को पत्र सोषियल मीडिया पर तेजी से वाइरल हुआ और मजबूरन डाॅ. जोषी को मुख्य चुनाव आयुक्त को पत्र लिखना पड़ा कि उनके द्वारा इस तरह का कोई पत्र नहीं लिखा गया व इसकी जांच करवाई जाए। इसी तरह से सेना के दिग्गजों द्वारा राष्ट्रपति को लिखी गई चिट््टी पर भी विवाद उभर कर सामने आया। यह किसी पाबर््ी विषेष से जुड़ी वाइरल खबरों की बात नहीं है अपितु लगभग सभी दल इससे कमोबेस प्रभावित हो रहे हैं। राजनीतिक दलों के सोषियल मीडया हैण्डल करने वाली टीमों में से कुछ का काम तो इस तरह की वाइरल खबरों का सच सामने लाने में लग जाता है वहीं माने या माने पर इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती की इस तरह की वाइरल खबरें जो सत्य से परे या भ्रम पैदा करने वाली होती है वे एक रणनीति के तहत भी जारी हो रही है। यही कारण है कि जिस तरह से एक समय पेड न्यूज चुनावों को प्रभावित करने में आगे थी लगभग वैसे ही अैर उससे भी ज्यादा सोषियल मीडिया के दुरुपयोग करती यह वाइरल फेक पोस्टें है। हो यह रहा है कि प्रमुख समाचार पत्रों और चैनलों द्वारा इस तरह की पोस्टों का वाइरल टेस्ट कर सच झूठ सामने लाने का काम करना पड़ रहा है। मजे की बात यह है कि इस तरह की वाइरल पोस्टे इस तेजी से वाइरल होती है कि वाइरल टेस्ट या स्पष्टीकरण की खबरों का असर लगभग नहीं के बराबर रह जाता है।
दरअसल एक रणनीति के तहत सोषियल मीडिया को एक हथियार के रुप में उपयोग किया जा रहा है। इसके साथ ही डीजिटल मीडिया की हैडलाइन्स जिस तरह से सोषियल मीडिया पर परोसी जा रही है वह भी अपने आपमें गंभीर है। इससे यह साफ लगने लगा है कि मतदाताओं में भ्रम की स्थिति जितनी संभव हो उतनी पैदा की जाए। हांलाकि चुनाव आयोग इसे लेकर गंभीर है। पिछले दिनों ही सोषियल मीडिया के संचालकों को सख्त हिदायत दी गई है कि वे अपने प्लेटफार्म का दुरुपयोग होने से रोकने के हरसंभव कदम उठाए। पिछले दिनों वाट््सएप से कांग्रेस और बीजेपी की सैकड़ों इस तरह की पोस्टों को हटाया गया है। दरअसल राजनीतिक दलों को यह समझ तो हो गई है कि मतदाताओं को प्रभावित करने मंे सोषियल मीडिया की प्रमुख भूमिका हो चुकी है। सोषियल मीडिया को लेकर चुनाव आयोग ने दिषा-निर्देष भी जारी किए हैं। इन सबके बावजूद कोई ना कोई शरारती फेक न्यूज पोस्ट कर देता है और वह इस तेजी से वाइरल होती है कि सच सामने आने तक वह पोस्ट इतनी फैल जाती है कि सच दबा रह जाता है।
दुनिया में हमारे लोकतंत्र की अपनी अहमियत रही है। हमारी निर्वाचन प्रक्रिया की सारी दुनिया कायल है। जिस तरह से चुनाव आयोग ने निष्पक्ष व साफ सुथरा चुनाव की व्यवस्था सुनिष्चित की है वह तारिफें काबिल है। राजनीतिक दलों या यों कहे कि पेड न्यूज के माध्यम से चुनावों को प्रभावित करने के प्रयासों को काफी हद तक चुनाव आयोग ने कम कर दिया है। इसी तरह से चुनाव आयोग ने मतदाताओं में विष्वास पैदा करने के हर संभव प्रयास किए हैं। लगभग 99 प्रतिषत मतदाताओं के फोटो पहचान पत्र बन गए हैं। मतदान परचियों के लिए अब प्रत्याषियों या राजनीतिक दलों की भूमिका लगभग खत्म हो गई है। मतदान केन्द्र निकटतम स्थान पर बनाए जा रहे हैं वहीं चुनाव में बाहुबल या धनबल पर रोक के सार्थक प्रयास किए गए हैं। पुलिस प्रषासन और सुरक्षा बलों की तैनाती से लोगों में विष्वास पैदा हुआ है। वीडियोग्राफी भी आवष्यकतानुसार होने लगी है। इन चुनावों में सभी मतदान केन्द्रों पर वीवीपैट मषीनें लगाई जा रही है। सर्वोच्च अदालत के निर्देषों से अब एक की जगह पांच वीवीपैट से मिलान करने का निर्णय किया गया है। आखिर इन सब सुधारों के बाद तू डाल डाल मैं पात पात के की तर्ज पर सोषियल मीडिया क दुरुपयोग को रोकने की बड़ी चुनौती सामने आई है। ऐसे में लोगों को गंभीर होना ही होगा।
हांलाकि यह थोड़ा ज्यादा अवष्य लगे पर सोषियल मीडिया की विष्वसनीयता बनाए रखने के लिए फेक न्यूज पोस्ट करने वाले तत्वों पर यदि संकेतमात्र के लिए भी उन्हें चिन्हित कर सख्त कार्यवाही की जाती है तो आने वाले समय मंे सोषियल मीडिया के दुरुपयोग को रोका जा सकेगा। यह तो खैर मतदाताओं को प्रभावित करने वाली बात है पर इससे अधिक दुर्भाग्य क्या होगा कि कहीं भी अप्रिय घटना होते ही आज प्रषासन इंटरनेट सेवाओं को बाधित करता है, इससे अधिक शर्मनाक क्या होगा हमारे लिए। सही तो यह हो कि सोषियल मीडिया पर आप अपनी बात प्रभावी तरीके से पहुंचाए पर भ्रमित करने वाली या फेक या आडियों-वीडियों को तकनीक से तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करने का घिनोना काम नहीं होना चाहिए। आखिर चुनाव लोकतंत्र का महाउत्सव है और उत्सव की पवित्रता बनाए रखने का दायित्व चुनाव आयोग या प्रषासन का ही नहीं अपितु देष के प्रत्येक नागरिक का होजाता है।

रघुराज, एफ-2, रामनगर विस्तार, चित्रांष स्कूल की गली,
ज्योति बा फूले काॅलेज के पास, स्वेज फार्म, सोडाला, जयपुर-19
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मुंबई (हम हिंदुस्तानी)-बहुमुखी अभिनेता इरफान ने हाल ही में उदयपुर में दिनेश विजान की फिल्म अंग्रेजी मीडियम के लिए शूटिंग शुरू की, जो इरफान और विजान की 2017 की सफल फिल्म हिंदी मीडियम की सीक्वल है। जब पिछले साल वे अपने इलाज के लिए लंदन में थे उसके बाद से अंग्रेजी मीडियम इरफान का पहला प्रोजेक्ट है। अब सुनने में आया है कि बहुमुखी अभिनेता पंकज त्रिपाठी उदयपुर में अंग्रेजी माध्यम के कलाकारों में शामिल हो रहे हैं। ये दो पावर-पैक कलाकार पहली बार एक साथ स्क्रीन स्पेस साझा करते हुए दिखाई देंगे। इरफान और पंकज दोनों ही नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के पूर्व छात्र हैं और अभिनय के परदे पर एक बहुत ही अलग कला का प्रतिनिधित्व करते हैं और सही मायने में दोनों ही प्रतिभा का एक पावरहाउस हैं। पंकज और दिनेश विजान अंग्रेजी मीडियम के माध्यम से तीसरी बार एक साथ आए हैं। उनका पहला साथ का प्रॉजेक्ट फिल्म स्त्री था और उसके बाद लुका चुप्पी। दोनों का एक-दूसरे के साथ शानदार तालमेल बैठता है और वे साथ काम करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। पंकज फिल्म में कैमियो करते नजर आएंगे लेकिन यह दर्शकों के लिए एक शानदार अनुभव साबित होने वाला है। स्क्रीन पर एक साथ दो ऐसे अद्भुत कलाकारों को देखना वास्तव में दर्शकों के लिए मनोरंजक होगा। जब पंकज से पूछा गया, तो उन्होंने कहा, "मेरी भूमिका एक कैमियो है। यह इरफान के लिए मेरा प्यार और सम्मान है और दीनू के साथ मेरी दोस्ती जिसकी वजह से मैंनें इसके लिए हां कहा। मैं हमेशा इरफान के साथ काम करना चाहता था और जब दीनू ने इस भूमिका की पेशकश की तो मैं इस भूमिका को करने के लिए तुरंत राजी हो गया भले ही यह सिर्फ एक कैमियो हो।"


मुंबई (हम हिंदुस्तानी)-बहुमुखी अभिनेता इरफान ने हाल ही में उदयपुर में दिनेश विजान की फिल्म अंग्रेजी मीडियम के लिए शूटिंग शुरू की, जो इरफान और विजान की 2017 की सफल फिल्म हिंदी मीडियम की सीक्वल है। जब पिछले साल वे अपने इलाज के लिए लंदन में थे उसके बाद से अंग्रेजी मीडियम इरफान का पहला प्रोजेक्ट है। अब सुनने में आया है कि बहुमुखी अभिनेता पंकज त्रिपाठी उदयपुर में अंग्रेजी माध्यम के कलाकारों में शामिल हो रहे हैं। ये दो पावर-पैक कलाकार पहली बार एक साथ स्क्रीन स्पेस साझा करते हुए दिखाई देंगे। इरफान और पंकज दोनों ही नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के पूर्व छात्र हैं और अभिनय के परदे पर एक बहुत ही अलग कला का प्रतिनिधित्व करते हैं और सही मायने में दोनों ही प्रतिभा का एक पावरहाउस हैं। पंकज और दिनेश विजान अंग्रेजी मीडियम के माध्यम से तीसरी बार एक साथ आए हैं। उनका पहला साथ का प्रॉजेक्ट फिल्म स्त्री था और उसके बाद लुका चुप्पी। दोनों का एक-दूसरे के साथ शानदार तालमेल बैठता है और वे साथ काम करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। पंकज फिल्म में कैमियो करते नजर आएंगे लेकिन यह दर्शकों के लिए एक शानदार अनुभव साबित होने वाला है। स्क्रीन पर एक साथ दो ऐसे अद्भुत कलाकारों को देखना वास्तव में दर्शकों के लिए मनोरंजक होगा। जब पंकज से पूछा गया, तो उन्होंने कहा, "मेरी भूमिका एक कैमियो है। यह इरफान के लिए मेरा प्यार और सम्मान है और दीनू के साथ मेरी दोस्ती जिसकी वजह से मैंनें इसके लिए हां कहा। मैं हमेशा इरफान के साथ काम करना चाहता था और जब दीनू ने इस भूमिका की पेशकश की तो मैं इस भूमिका को करने के लिए तुरंत राजी हो गया भले ही यह सिर्फ एक कैमियो हो।"


मुंबई (हम हिंदुस्तानी)-बहुमुखी अभिनेता इरफान ने हाल ही में उदयपुर में दिनेश विजान की फिल्म अंग्रेजी मीडियम के लिए शूटिंग शुरू की, जो इरफान और विजान की 2017 की सफल फिल्म हिंदी मीडियम की सीक्वल है। जब पिछले साल वे अपने इलाज के लिए लंदन में थे उसके बाद से अंग्रेजी मीडियम इरफान का पहला प्रोजेक्ट है। अब सुनने में आया है कि बहुमुखी अभिनेता पंकज त्रिपाठी उदयपुर में अंग्रेजी माध्यम के कलाकारों में शामिल हो रहे हैं। ये दो पावर-पैक कलाकार पहली बार एक साथ स्क्रीन स्पेस साझा करते हुए दिखाई देंगे। इरफान और पंकज दोनों ही नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के पूर्व छात्र हैं और अभिनय के परदे पर एक बहुत ही अलग कला का प्रतिनिधित्व करते हैं और सही मायने में दोनों ही प्रतिभा का एक पावरहाउस हैं। पंकज और दिनेश विजान अंग्रेजी मीडियम के माध्यम से तीसरी बार एक साथ आए हैं। उनका पहला साथ का प्रॉजेक्ट फिल्म स्त्री था और उसके बाद लुका चुप्पी। दोनों का एक-दूसरे के साथ शानदार तालमेल बैठता है और वे साथ काम करने के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं। पंकज फिल्म में कैमियो करते नजर आएंगे लेकिन यह दर्शकों के लिए एक शानदार अनुभव साबित होने वाला है। स्क्रीन पर एक साथ दो ऐसे अद्भुत कलाकारों को देखना वास्तव में दर्शकों के लिए मनोरंजक होगा। जब पंकज से पूछा गया, तो उन्होंने कहा, "मेरी भूमिका एक कैमियो है। यह इरफान के लिए मेरा प्यार और सम्मान है और दीनू के साथ मेरी दोस्ती जिसकी वजह से मैंनें इसके लिए हां कहा। मैं हमेशा इरफान के साथ काम करना चाहता था और जब दीनू ने इस भूमिका की पेशकश की तो मैं इस भूमिका को करने के लिए तुरंत राजी हो गया भले ही यह सिर्फ एक कैमियो हो।"


भवानीमंडी:- भवानीमंडी राजस्थान के कवि एवम साहित्यकार राजेश कुमार शर्मा पुरोहित को सूर्य नगरी जोधपुर में आयोजित सम्मान समारोह में राजन वेलफेयर एन्ड डवलपमेंट संस्थान जोधपुर राजस्थान एवम स्टार हिन्दी ब्लॉग द्वारा स्टार हिन्दी बेस्ट राइटर अवार्ड 2019 से सम्मानित किया।
पुरोहित ने बताया कि उन्हें यह सम्मान नियमित रूप से आलेख सृजन करने एवम हिन्दी भाषा के उन्नयन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रदान किया।
उन्हें यह सम्मान श्री एल .आर.सेजु थोब प्रिंस,संपादक स्टार हिन्दी ब्लॉग,खेमदान चारण सचिव राजन वेलफेयर एन्ड डवलपमेंट संस्थान,भावना चारण, अध्यक्ष राजन वेलफेयर एन्ड डवलपमेंट संस्थान के कर कमलों द्वारा प्रदान किया गया।
पुरोहित को आगमन,शीर्षक साहित्य परिषद,मधुशाला,साहित्य संगम संस्थान, सहित देश की शीर्ष साहित्यिक संस्थाओं के रचनाकारों ने बधाइयाँ प्रेषित की है।

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नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

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