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आजादी हर किसी को पसंद है, अब वह चाहे राजनीतिक आजादी हो या फिर वित्तीय आजादी। क्योंकि ये भाव हमें अपनी मर्जी का काम करने के लिए प्रेरित करता है। कुछ ऐसा काम जिसे किसी के दबाव में रहकर नहीं किया जा सकता राजनीतिक आजादी तो हमें बहुत पहले मिल गई, अब आर्थिक आजादी के संकल्प को पूरा करने का समय आ गया है।पैसे कमाने की चिंता किए बिना अपनी शर्तों पर काम करना ही वित्तीय आजादी है, जिसे जॉब करने वाला हर व्यक्ति हासिल कर सकता है, अगर बचत और निवेश सही दिशा में हो। जो लोग निवेश करते हैं, उनकी वित्तीय प्लानिंग बहुत ही जबर्दस्त होती है। उनका ध्यान मुख्य रूप से तीन चीजों पर होता है -बचत, निवेश और खर्च। उनका सिद्धांत स्पष्ट है, ज्यादा से ज्यादा पैसे की बचत करो और उसे सही जगह निवेश करो। जो चीजें गैर जरूरी हैं, उसे खरीदने के बजाय उसी पैसे को वो निवेश करना पसंद करते हैं। विश्व के जाने माने निवेशक और कारोबारी वारेन बफेट ने फिजूल खर्च करने वालों पर एक बात कही थी।उन्होंने कहा था, ;यदि आप उन चीजों को खरीदते हैं, जिनकी आपको जरूरत नहीं है, तो शीघ्र ही आपको उन चीजों को बेचना पड़ जाएगा जिनकी आपको जरूरत है।हाल के सालों में शेयर मार्केट और म्यूचुअल फंड में निवेश को लेकर युवाओं का उत्साह बढ़ा है। हालांकि, शेयर मार्केट में मार्केट को समझने के लिए ज्यादा समय देना पड़ता है, वहीं म्यूचुअल फंड में यही काम फंड मैनेजर कर देता है। इसलिए देखा गया है कि जॉब करने वाले ज्यादातर व्यक्ति म्यूचुअल फंड में ही निवेश करना पसंद करते हैं। आप अगर युवा हैं और आप चाहते हैं कि रिटायरमेंट से बहुत पहले ही आपको वित्तीय आजादी मिल जाए, तो आपको बचत, निवेश और खर्च पर एक सही योजना बनानी होगी। इसके लिए आपको एक्सपर्ट्स की मदद लेनी चाहिए, खासकर तब, जब आप निवेश कर रहे हैं। एक्सपर्ट्स की राय से मार्केट को अच्छी तरह से समझने का मौका मिलता है, जिससे निवेशक सही जगह पर निवेश कर पाता है।विशेषज्ञों की राय लेकर आप अपनी योजनाओं की रूपरेखा को और भी बेहतर तरीके से तैयार कर सकते हैं। इस संबंध में ABSL (Aditya Birla Sun Life Mutual Fund) और Dainik Jagran एक ऐसी सीरीज लेकर आए हैं, जहां वेबिनार के जरिए लोगों को वित्तीय स्वतंत्रता, वित्तीय योजना, बचत, निवेश आदि के बारे में मार्केट के एक्सपर्ट द्वारा जागरूक किया जा रहा है। आज सीरीज का पांचवां और आखिरी दिन है, जिसे शिमला की जनता को ध्यान में रखकर आयोजित किया गया है

नई दिल्ली। कोरोना वायरस (कोविड-19) से मुकाबले की दिशा में ज्यादा प्रभावी वैक्सीन और दवाओं की तलाश में निरंतर शोध किए जा रहे हैं। इसी प्रयास में जुटे विज्ञानियों ने प्रोटीन आधारित एक नई वैक्सीन विकसित की है। यह वैक्सीन शरीर में पहुंचने के बाद वायरस का आकार लेती है। इस तरीके से कोरोना के खिलाफ ज्यादा मजबूत सुरक्षा मुहैया हो सकती है। पशुओं पर परीक्षण में इस वैक्सीन से मजबूत एंटीबाडी रिस्पांस पाया गया।एसीएस सेंट्रल साइंस पत्रिका में छपे अध्ययन के शोधकर्ताओं के अनुसार, चूहों को ऐसे नैनोपार्टिकल के साथ यह वैक्सीन लगाई गई, जो कोरोना का कारण बनने वाले सार्स-कोव-2 वायरस जैसा आकार लेकर रिसेप्टर बाइंडिंग डोमेन (आरबीडी) एंटीजन की प्रतिकृति तैयार करते हैं। प्रोटीन आधारित ज्यादातर टीके इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा प्रणाली) को आरबीडी की पहचान करने में दक्ष करने का काम करते हैं।आरबीडी कोरोना के स्पाइक प्रोटीन का एक हिस्सा है। यह वायरस इसी प्रोटीन के इस्तेमाल से मानव कोशिकाओं में दाखिल होता है और संक्रमण फैलाता है। हालांकि सभी टीकों से एंटीबाडी और टी सेल रिस्पांस मिल नहीं पाता है। ये दोनों दीर्घकालीन इम्युनिटी के लिए महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका की शिकागो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पूर्व में पालीमर्सोम नामक एक वैक्सीन डिलिवरी टूल विकसित किया था। यह टूल एंटीजन और एजवेंट्स को इम्यून सेल्स (प्रतिरक्षा कोशिकाओं) में पहुंचा सकता है।एजवेंट्स हेल्पर मोलीक्यूल होते हैं, जो इम्यून रिस्पांस को मजबूत करने का काम करते हैं। शोधकर्ताओं की टीम यह जानकर चकित रह गई कि अगर इस तरीके में कुछ बदलाव किया जाए तो एंटीबाडी रिस्पांस को और बेहतर किया जा सकता है। उन्होंने लैब में कुछ बदलाव के बाद नैनोपार्टिकल के साथ एजवेंट्स युक्त पालीमर्सोम की खुराक चूहों को दी। इसके बाद इसके प्रभाव पर गौर किया। शोधकर्ताओं ने कहा कि इंसानों पर नई वैक्सीन के प्रभाव और सुरक्षा को आंकने की जरूरत है।

वाशिंगटन। अफगानिस्तान में तालिबानियों का आतंक गहराता जा रहा है। चारों तरफ कत्लेआम और हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे। हर दिन अलग-अलग शहरों पर तालिबानी कब्जा कर रहे हैं। इस बीच अमेरिका काबुल से अपने दूतावास कर्मचारियों को सुरक्षित निकालने के लिए 3,000 सैनिकों को अफगानिस्तान भेज रहा है।अफगानिस्तान में तालिबानियों ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया है।‌ तालिबान ने देश का दूसरा सबसे बड़ा शहर कंधार और काबुल के निकट युद्ध नीति के रूप से सबसे महत्वपूर्ण एवं राजधानी और देश का तीसरे सबसे बड़ा शहर हेरात के साथ-साथ तालिबानियों ने 34 प्रांतीय राजधानियों में से 11 पर कब्जा कर लिया है।अफगानिस्तान में तेजी से बदलते हालात, काबुल के निकट सामरिक रूप से तालिबानियों का कब्जा और तालिबान की मजबूत होती पकड़ को देखते हुए अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपनी सेना भेजने का फैसला लिया है। यह फैसला अफगानिस्तान की सेना को सहारा देने के लिए नहीं बल्कि काबुल में स्थित अपने दूतावास के कर्मचारियों, नागरिकों और स्पेशल वीजा आवेदकों को वहां से निकलने लिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के नेतृत्व वाली सरकार के एक अधिकारी ने गुरुवार को इसकी जानकारी दी । अमेरिकी रक्षा विभाग के अधिकारी ने बताया कि 3000 सैनिक अफगानिस्तान से अमेरिकी कर्मचारियों और नागरिकों की रक्षा और उनकी सुरक्षित निकासी के लिए भेजे जा रहे हैं।तीन हजार अमेरिकी सैनिक तुरंत काबुल के हामिद करजई अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर तैनात होंगे। ये अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से अमेरिकी नागरिकों की वापसी में मदद करेंगे और उन्हें विमान सुविधा और सुरक्षा मुहैया कराएंगे। इसके अलावा, करीब 1000 अन्य अमेरिकी सुरक्षाकर्मियों को कतर भेजा जाएगा ताकि उन अफगानों के प्रबंधन में मदद मिल सके जिन्हें अफगानिस्तान से निकाला जा रहा है और विशेष वीजा पर अमेरिका में स्थानांतरित किया जा रहा है। जरूरत पड़ने पर अफगानिस्तान भेजे जाने के लिए अमेरिकी बेस से कुवैत में तैनात होने के लिए 35000 सैनिक स्टैंडबाय पर रहेंगे। 

वाशिंगटन। अफगानिस्तान में तालिबानियों का आतंक गहराता जा रहा है। चारों तरफ कत्लेआम और हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे। हर दिन अलग-अलग शहरों पर तालिबानी कब्जा कर रहे हैं। इस बीच अमेरिका काबुल से अपने दूतावास कर्मचारियों को सुरक्षित निकालने के लिए 3,000 सैनिकों को अफगानिस्तान भेज रहा है।अफगानिस्तान में तालिबानियों ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया है।‌ तालिबान ने देश का दूसरा सबसे बड़ा शहर कंधार और काबुल के निकट युद्ध नीति के रूप से सबसे महत्वपूर्ण एवं राजधानी और देश का तीसरे सबसे बड़ा शहर हेरात के साथ-साथ तालिबानियों ने 34 प्रांतीय राजधानियों में से 11 पर कब्जा कर लिया है।अफगानिस्तान में तेजी से बदलते हालात, काबुल के निकट सामरिक रूप से तालिबानियों का कब्जा और तालिबान की मजबूत होती पकड़ को देखते हुए अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपनी सेना भेजने का फैसला लिया है। यह फैसला अफगानिस्तान की सेना को सहारा देने के लिए नहीं बल्कि काबुल में स्थित अपने दूतावास के कर्मचारियों, नागरिकों और स्पेशल वीजा आवेदकों को वहां से निकलने लिया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के नेतृत्व वाली सरकार के एक अधिकारी ने गुरुवार को इसकी जानकारी दी । अमेरिकी रक्षा विभाग के अधिकारी ने बताया कि 3000 सैनिक अफगानिस्तान से अमेरिकी कर्मचारियों और नागरिकों की रक्षा और उनकी सुरक्षित निकासी के लिए भेजे जा रहे हैं।तीन हजार अमेरिकी सैनिक तुरंत काबुल के हामिद करजई अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर तैनात होंगे। ये अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान से अमेरिकी नागरिकों की वापसी में मदद करेंगे और उन्हें विमान सुविधा और सुरक्षा मुहैया कराएंगे। इसके अलावा, करीब 1000 अन्य अमेरिकी सुरक्षाकर्मियों को कतर भेजा जाएगा ताकि उन अफगानों के प्रबंधन में मदद मिल सके जिन्हें अफगानिस्तान से निकाला जा रहा है और विशेष वीजा पर अमेरिका में स्थानांतरित किया जा रहा है। जरूरत पड़ने पर अफगानिस्तान भेजे जाने के लिए अमेरिकी बेस से कुवैत में तैनात होने के लिए 35000 सैनिक स्टैंडबाय पर रहेंगे। 

इस्‍लामाबाद। पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री ने कहा है कि वो अमेरिका के राष्‍ट्रपति जो बाइडन के फोन का अब इंतजार नहीं कर रहे हैं। उन्‍होंने कहा है कि वो सुन रहे हैं क‍ि वो उन्‍हें फोन नहीं करेंगे। ये उनका अपना फैसला है, लिहाजा वो उनकी तरफ से आने वाले किसी फोन का इंतजार नहीं कर रहे हैं। अपने आवास पर विदेशी मीडिया को दिए इंटरव्‍यू में उन्‍होंने अमेरिका से रिश्‍तों में आई गिरावट की वजह भी बताई और अफगानिस्‍तान के मुद्दे पर भी चर्चा की। इस इंटरव्‍यू में भी वो भारत पर अंगुली उठाने से बाज नहीं आए।पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अमेरिका से संबंधों में आई गिरावट की दो बड़ी वजह बताईं। उन्‍होंने कहा कि अमेरिका भारत को अपना रणनीतिक साझेदार मानता है इसलिए अमेरिका लगातार पाकिस्‍तान को तवज्‍जो नहीं दे रहा है। इसकी दूसरी वजह उन्‍होंने चीन से बेहतर संबंधों को माना है। इमरान खान ने कहा कि क्‍योंकि उनके संबंध चीन से बेहद पुराने और बेहद मजबूत हैं, इसलिए भी पाकिस्‍तान को ताक पर रखा जा रहा है।उन्‍होंने ये भी कहा कि पाकिस्‍तान हर बार इस बात को कहता रहा है कि राष्‍ट्रपति बाइडन के पाकिस्‍तान से बात न करने के पीछे तकनीकी या फिर दूसरी वजह रही होंगी। लेकिन, ये बातें पाकिस्‍तान की जनता के गले नहीं उतरती हैं। वो इस पर विश्‍वास करने को कतई तैयार भी नहीं है। इमरान ने कहा कि यदि पाकिस्‍तान के साथ फोन पर होने वाली बातचीत और दोनों के बीच सुरक्षा संबंध किसी तरह की रियायत है तो फिर पाकिस्‍तान के पास भी दूसरे विकल्‍प मौजूद हैं, जिनके बारे में वो सोच भी सकता है और उनके साथ जा भी सकता है।अफगानिस्‍तान के मुद्दे पर बात करते हुए इमरान खान ने कहा कि अमेरिकी फौज दो दशक तक तालिबान का कुछ नहीं कर सकी। वो अब अफगानिस्‍तान को बीच मझधार में छोड़कर जा रहे हैं, जिससे हालात और खराब हो रहे हैं। उन्‍होंने इशारों ही इशारों में पाकिस्‍तान को अफगानिस्‍तान के हालातों को सुधारने के लिए एक अहम देश बताया। उनका कहना था कि ये बेहद सामान्‍य सी बात है कि यदि आप अफगानिस्‍तान का राजनीतिक समाधान चाहते हैं तो आपको ताकतवर के साथ बात करनी होगी। लेकिन, अमेरिका अब अफगानिस्‍तान की बदहाली के लिए पाकिस्‍तान को ही जिम्‍मेदार ठहरा रहा है, जो कि गलत हैउन्‍होंने ये भी कहा कि अफगानिस्‍तान के हालात को लेकर वो खुद चिंता में हैं। इसकी वजह ये है कि वहां पर चलने वाले सिविल वार से वो सीधेतौर पर प्रभावित होते हैं। पाकिस्‍तान ही इससे सबसे अधिक प्रभावित रहा है। उनके मुताबिक तालिबान में अधिकतर मख्‍तून हैं जो पाकिस्‍तान में रहने वाले पख्‍तूनों को प्रभावित करते हैं। वर्ष 2003 और 2004 में भी पाकिस्‍तान में रहने वाले पख्‍तूनों ने अफगानिस्‍तान के हालातों पर काफी आक्रामक रुख अपनाया था। इसमें पाकिस्‍तान के करीब 70 हजार लोग भी मारे गए थे क्‍योंकि हम अमेरिका का समर्थन कर रहे थे।

इस्‍लामाबाद। पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री ने कहा है कि वो अमेरिका के राष्‍ट्रपति जो बाइडन के फोन का अब इंतजार नहीं कर रहे हैं। उन्‍होंने कहा है कि वो सुन रहे हैं क‍ि वो उन्‍हें फोन नहीं करेंगे। ये उनका अपना फैसला है, लिहाजा वो उनकी तरफ से आने वाले किसी फोन का इंतजार नहीं कर रहे हैं। अपने आवास पर विदेशी मीडिया को दिए इंटरव्‍यू में उन्‍होंने अमेरिका से रिश्‍तों में आई गिरावट की वजह भी बताई और अफगानिस्‍तान के मुद्दे पर भी चर्चा की। इस इंटरव्‍यू में भी वो भारत पर अंगुली उठाने से बाज नहीं आए।पाकिस्‍तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने अमेरिका से संबंधों में आई गिरावट की दो बड़ी वजह बताईं। उन्‍होंने कहा कि अमेरिका भारत को अपना रणनीतिक साझेदार मानता है इसलिए अमेरिका लगातार पाकिस्‍तान को तवज्‍जो नहीं दे रहा है। इसकी दूसरी वजह उन्‍होंने चीन से बेहतर संबंधों को माना है। इमरान खान ने कहा कि क्‍योंकि उनके संबंध चीन से बेहद पुराने और बेहद मजबूत हैं, इसलिए भी पाकिस्‍तान को ताक पर रखा जा रहा है।उन्‍होंने ये भी कहा कि पाकिस्‍तान हर बार इस बात को कहता रहा है कि राष्‍ट्रपति बाइडन के पाकिस्‍तान से बात न करने के पीछे तकनीकी या फिर दूसरी वजह रही होंगी। लेकिन, ये बातें पाकिस्‍तान की जनता के गले नहीं उतरती हैं। वो इस पर विश्‍वास करने को कतई तैयार भी नहीं है। इमरान ने कहा कि यदि पाकिस्‍तान के साथ फोन पर होने वाली बातचीत और दोनों के बीच सुरक्षा संबंध किसी तरह की रियायत है तो फिर पाकिस्‍तान के पास भी दूसरे विकल्‍प मौजूद हैं, जिनके बारे में वो सोच भी सकता है और उनके साथ जा भी सकता है।अफगानिस्‍तान के मुद्दे पर बात करते हुए इमरान खान ने कहा कि अमेरिकी फौज दो दशक तक तालिबान का कुछ नहीं कर सकी। वो अब अफगानिस्‍तान को बीच मझधार में छोड़कर जा रहे हैं, जिससे हालात और खराब हो रहे हैं। उन्‍होंने इशारों ही इशारों में पाकिस्‍तान को अफगानिस्‍तान के हालातों को सुधारने के लिए एक अहम देश बताया। उनका कहना था कि ये बेहद सामान्‍य सी बात है कि यदि आप अफगानिस्‍तान का राजनीतिक समाधान चाहते हैं तो आपको ताकतवर के साथ बात करनी होगी। लेकिन, अमेरिका अब अफगानिस्‍तान की बदहाली के लिए पाकिस्‍तान को ही जिम्‍मेदार ठहरा रहा है, जो कि गलत हैउन्‍होंने ये भी कहा कि अफगानिस्‍तान के हालात को लेकर वो खुद चिंता में हैं। इसकी वजह ये है कि वहां पर चलने वाले सिविल वार से वो सीधेतौर पर प्रभावित होते हैं। पाकिस्‍तान ही इससे सबसे अधिक प्रभावित रहा है। उनके मुताबिक तालिबान में अधिकतर मख्‍तून हैं जो पाकिस्‍तान में रहने वाले पख्‍तूनों को प्रभावित करते हैं। वर्ष 2003 और 2004 में भी पाकिस्‍तान में रहने वाले पख्‍तूनों ने अफगानिस्‍तान के हालातों पर काफी आक्रामक रुख अपनाया था। इसमें पाकिस्‍तान के करीब 70 हजार लोग भी मारे गए थे क्‍योंकि हम अमेरिका का समर्थन कर रहे थे।

लंदन। ब्रिटेन ने अफगानिस्‍तान के ताजा हालातों पर चिंता जताई है। ब्रिटेन के रक्षा मंत्री ने कहा है कि वो अफगानिस्‍तान में तालिबान की वापसी की आशंका से काफी चिंतित हैं। उन्‍होंने कहा कि यदि ऐसा हुआ तो एक असफल राज्‍य के तौर पर अफगानिस्‍तान अलकायदा जैसे आतंकवादियों के लिए प्रजनन स्थल बन सकता है। रक्षा मंत्री बेन वैलेस ने स्‍काई से बात करते हुए इस बात की आशंका जताई कि वहां पर अलकायदा की भी वापसी हो सकती है।वैलेस ने ये भी कहा कि पश्चिमी देश वहां के हालातों को समझ भी रहे हैं और जान भी रहे हैं। लेकिन वो तुरंत कुछ कर पाने की स्थिति में भी नहीं है। इतना जरूरी है कि वो वहां के हालातों को मैनेज जरूर कर सकते हैा। उन्‍होंने ये भी कहा कि तालिबान ने अफगानिस्‍तान के बड़े शहरों को अपने कब्‍जे में ले लिया है। देश के दूसरे बड़े शहर कंधार पर उसका कब्‍जा हो गया है और लश्‍कारगाह भी अब उनके हाथों में चला गया है। तालिबान जिस तेजी के साथ देश में आगे की तरफ बढ़ रहा है वो वास्‍तव में हैरान करने वाली है। इसने अफगानिस्‍तान की सरकार और पश्चिमी देशों को भी हैरानी में डाल दिया हैगौरतलब है कि जब से अमेरिका ने अपनी और नाटो फौज को अफगानिस्‍तान से वापसी का फरमान दिया है तभी से तालिबान ने देश में हमले तेज कर दिया है। देश के करीब दो तिहाई हिस्‍से पर उसका कब्‍जा हो गया है, वहीं सरकार की फौज एक सीमित इलाके तक ही रह गई है।आपको बता दें कि तालिबान ने 1996 से लेकर 2001 तक अफगानिस्‍तान के एक बड़े इलाके पर कब्‍जा कर लिया था। उस वक्‍त यहां पर अलकायदा भी पैर जमा चुका था और उसके सरगना ओसामा बिन लादेन के साथ तालिबान के बेहद करीबी रिश्‍ते भी थे। अमेरिका पर हुए सबसे बड़े आतंकी हमले के बाद जब अमेरिका ने यहां पर कदम रखा तो तालिबान को पीछे हटना पड़ा था। इन दो दशकों के दौरान तालिबान का इलाका काफी सीमित हो चुका था। लेकिन अमेरिका की यहां से वापसी के साथ ही तालिबान के कदम फिर तेजी से आगे की तरफ बढ़ रहे हैं।बता दें कि एक समय में अफगानिस्‍तान में तालिबान, इस्‍लामिक स्‍टेट और अलकायदा का नेटवर्क काफी मजबूत था। बीते दो दशक में जहां आईएस और अलकायदा काफी कुछ खत्‍म हो चुका है वहीं तालिबान का न सिर्फ इस दौरान वजूद बरकरार रहा बल्कि उसने खुद को मजबूत बनाया है।

काबुल। तालिबान ने अफगानिस्‍तान के हेरात शहर में पूर्व मुजाहिद्दीन कमांडर मोहम्‍मद इस्‍माइल खान को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। हेरात शहर पर अब तालिबान का कब्‍जा हो चुका है। आपको बता दें कि मोहम्‍मद इस्‍माइल खान हेरात के शेर (Lion of Herat) के नाम से जाने जाते हैं। उन्‍होंने अपने लड़ाकों को अफगान सेना के साथ मिलकर लड़ने का आदेश दिया था, जिसके बाद हजारों की तादाद में उनके समर्थक तालिबान से विभिन्‍न इलाकों में लोहा ले रहे हैं। इस्‍माइल खान के अफगान सेना के साथ मिलकर अपने लड़ाकों को तैनात करने पर पाकिस्‍तान ने कड़ी नाराजगी भी जताई थी। पाकिस्‍तान का कहना था कि इससे हालात और अधिक खराब हो जाएंगे। तालिबान के प्रवक्‍ता जबीहुल्‍लाह मुजाहिद ने इस बात की पुष्टि की है कि इस्‍माइल खान उनकी गिरफ्त में है।आपको ये भी बता दें कि इस्‍माइल खान ने अमेरिकी सेना के साथ मिलकर तालिबान को एक इलाके तक सीमित करने में भी बड़ी भूमिका निभाई थी। इस्‍माइल खान का तालिबान की हिरासत में आना उनके समर्थकों के लिए मायूस करने वाला हो सकता है। उनके तालिबान के कब्‍जे में आने के बाद इस बात को लेकर असमंजस की स्थिति है कि आखिर तालिबान उनके साथ कैसे सुलूक करेगा। बता दें कि पिछले माह अफगानिस्‍तान के राष्‍ट्रपति अशरफ गनी ने भी हेरात के दौरे पर इस्‍माइल खान से मुलाकात की थी। तालिबान लड़ाकों ने उनके अलावा हेरात प्रांत के गवर्नर और दूसरे सुरक्षाकर्मियों को भी अपनी गिरफ्त में ले लिया है। इसकी जानकारी प्रांतीय काउंसिल के सदस्‍य गुलाम हबीब हाशिमी ने रायटर्स को दी है। हाशिमी ने कहा है कि तालिबान ने विश्‍वास दिलाया है कि उनके सामने आत्‍मसमर्पण करने वाले किसी भी सरकारी अधिकारी को वो कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे।गौरतलब है कि इस्‍माइल खान ने 1980 में सोवियत संघ के खिलाफ भी अफगानिस्‍तान में जंग की थी। उस वक्‍त वो नॉर्दन एलांइस के एक अहम सदस्‍य थे। इसके बाद वर्ष 2001 में अफगानिस्‍तान में अमेरिका के आने के बाद इस्‍माइल खान के लड़ाकों ने तालिबान को बाहर करने में पूरी ताकत झोंक दी थी। इस्‍माइल का तालिबान के कब्‍जे में होना न सिर्फ अफगान सेना बल्कि अमेरिका के लिए भी बुरी खबर है।

मॉस्को। अफगानिस्तान में तालिबान के बढ़ते प्रभुत्‍व के बीच रूस ने ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान के साथ साझा युद्धाभ्यास कर अपनी सैन्‍य ताकत का प्रदर्शन किया है। रूस को यह भय है कि अफगानिस्तान में बिगड़ते हालात का फायदा उठाकर आतंकी समूह मध्य एशियाई देशों में शांति को भंग कर सकते हैं। रूस का यह सोचना जायज है, क्‍यों कि कुछ दिनों पूर्व ऐसी रिपोर्ट सामने आई थी कि तालिबान से डरकर अफगान सेना के लगभग एक हजार जवान दूसरे देशों में पलायन कर गए थे। इसके बाद रूस की चिंता बढ़ गई है। ऐसे में यह सवाल उठ रहे हैं ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान के साथ साझा युद्धाभ्यास कर रूस क्‍या दिखाना चाहता है। इस युद्धाभ्‍यास के पीछे क्‍या निह‍ितार्थ है।

आतंकियों को रोकने के लिए इन हथियारों का करेंगे इस्तेमाल:-इस युद्धाभ्‍यास में रूसी Su-25 लड़ाकू विमानों ने आतंकवादियों की गाड़ियों पर एयरस्ट्राइक करने का अभ्यास किया। अफगानिस्तान के साथ ताजिक सीमा से लगभग 20 किलोमीटर उत्तर में हार्ब-मैडन फायरिंग रेंज में आयोजित किए गए युद्धाभ्यास में सैनिकों ने हमलावर आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई का अभ्यास किया। रूसी सेना की ओर से कहा गया है कि यह युद्धाभ्यास अफगानिस्तान में अस्थिरता को देखते हुए संभावित खतरों को दूर करने, मध्य एशियाई में सुरक्षा सुनिश्चित करने और स्थिरता बनाए रखने के लिए किया गया है। उन्होंने बताया कि तजाकिस्तान में रूसी सैनिकों ने अभ्यास के दौरान नए हथियारों का उपयोग करने का अभ्यास किया, जिसमें नई स्नाइपर राइफल और फ्लेम थ्रोअर शामिल हैं।

आतंकवादियों की घुसपैठ की स्थिति में अपने सहयोगी की मदद करेगा रूस:-रूस ने अफगानिस्तान से आतंकवादियों की घुसपैठ की स्थिति में अपने सहयोगी और अन्य पूर्व-सोवियत मध्य एशियाई देशों को सैन्य सहायता की पेशकश करने का वादा किया है। कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान समेत कई पूर्व सोवियत संघ से जुड़े देश रूस के नेतृत्व वाले कलेक्टिव सिक्योरिटी ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन के सदस्य हैं। इंटरफैक्स समाचार एजेंसी के अनुसार, रूस ने अपने सैन्य अड्डे को मजबूत करने के लिए 17 इन्फ्रेंट्री फाइटिंग व्हीकल को ताजिकिस्तान में तैनात किया है। बीएमपी -2 इन्फ्रेंट्री फाइटिंग व्हीकल की पहली बैच को कुछ दिनों पहले ही रूसी वायु सेना के ट्रांसपोर्ट विमान की मदद से दुशाम्बे पहुंचाया गया है। अफगान-ताजिक सीमा के पास रूसी टैंक पहले से ही तैनात हैं।

2500 सैनिकों ने युद्धाभ्यास में लिया हिस्सा:-गौरतलब है कि ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान का रूस के साथ मजबूत सैन्य संबंध हैं। इन देशों की सामरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी भी बहुत हद तक रूस पर ही निर्भर है। ऐसे में तालिबान की घुसपैठ को रोकने और सीमा पर चौकसी बढ़ाने के लिए रूस इन दो देशों के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास किया है। पिछले सप्ताह शुरू हुए इस अभ्यास में 2500 रूसी, ताजिक और उज़्बेक सैनिक शामिल हुए थे। इतना ही नहीं, तीनों देशों के लगभग 500 सैन्य वाहनों ने भी इस अभियान में हिस्सा लिया था।

रूस और चीन ने किया युद्धाभ्‍यास:-इसके पूर्व चीन और रूस के सैन्य बल उत्तर पश्चिमी चीन में संयुक्त अभ्यास कर चुके हैं। अफगानिस्तान में तालिबान कई बड़े क्षेत्रों पर अपना कब्जा कर चुका है। ऐसे में एशियाई देश नजदीक से स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। इनमें चीन भी है। निंग्जिया हुई स्वायत्त क्षेत्र में अर्ध सैनिक बलों और वायु सेना से जुड़े अभ्यास शुक्रवार तक जारी रहने वाले हैं। यह क्षेत्र शिंजियांग की सीमा पर है, जहां चीन ने 10 लाख से अधिक उइगरों और अन्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों के सदस्यों को आतंकवाद और चरमपंथ के खिलाफ सैनिक कार्यवाही करते हुए हिरासत में लिया है। बता दें कि शिनजियांग अफगानिस्तान के साथ एक संकरी सीमा साझा करता है और बीजिंग अपनी सीमा पर हिंसा फैलाने के डर से चिंतित है। यह डर है कि यदि तालिबान अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद देश में नियंत्रण ले लेता है तो चीन में क्षेत्रों में हलचल तेज हो जाएगी।

इस्लामाबाद। चीन ने अपने जेएफ-17 थंडर लड़ाकू विमानों की खूबी को बढ़ा-चढ़ाकर बताकर अपने सदाबहार मित्र पाकिस्तान को दिए थे। अब चीन निर्मित यही विमान पाकिस्तानी एयर फोर्स के लिए बोझ बन गए हैं। इंजन में गड़बड़ी, उच्च रखरखाव और विमानों के प्रदर्शन में गिरावट कारण बताए जा रहे हैं।दैनिक सन अखबार की खबर के अनुसार, वर्ष 1999 में चीन और पाकिस्तान ने जेएफ-17 के संयुक्त उत्पादन के लिए समझौता किया था। उस समय यह बताया गया था कि यह लड़ाकू विमान सुखोई-30 एमकेआइ, मिग-29 और मिराज-2000 जैसे लड़ाकू विमानों की तुलना में बेहतर है। बाद में पाकिस्तानी वायु सेना ने इन विमानों को दावों के आसपास भी नहीं पाया।इन विमानों में आरडी-93 एयरो इंजन लगे हैं, जो काला धुआं छोड़ते हैं। इससे किसी युद्ध के दौरान ये लड़ाकू विमान आसानी से निशाने पर आ सकते हैं। इस तरह की खामियां मिलने पर पाकिस्तान ने चीन से कई बार शिकायत की। चीन ने इंजन भी बदले, लेकिन समस्या खत्म नहीं हुई। इसकी वजह यह बताई गई है कि ये आरडी-93 इंजन रूसी हैं। प्रतिबंधों के चलते रूस से इसके पार्ट और दूसरी मदद नहीं मिल पा रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, चीन जेएफ-17 के लिए एक नया इंजन विकसित कर रहा है। लेकिन इसमें लंबा वक्त लग सकता है।

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नार्थ अमेरिका में भारत की राष्ट्रीय भाषा 'हिन्दी' का पहला समाचार पत्र 'हम हिन्दुस्तानी' का शुभारंभ 31 अगस्त 2011 को न्यूयॉर्क में भारत के कौंसल जनरल अम्बैसडर प्रभु दियाल ने अपने शुभ हाथों से किया था। 'हम हिन्दुस्तानी' साप्ताहिक समाचार पत्र के शुभारंभ का यह पहला ऐसा अवसर था जब नार्थ अमेरिका में पहला हिन्दी भाषा का समाचार पत्र भारतीय-अमेरिकन्स के सुपुर्द किया जा रहा था। यह समाचार पत्र मुख्य सम्पादकजसबीर 'जे' सिंह व भावना शर्मा के आनुगत्य में पारिवारिक जिम्मेदारियों को निर्वाह करते हुए निरंतर प्रकाशित किया जा रहा है Read more....

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