लखनऊ। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में अपने जुझारूपन के लिए विख्यात यशपाल शर्मा का लखनऊ के साथ उत्तर प्रदेश में भी लम्बा समय बीता। लखनऊ के ग्रीष्मकालीन अखिल भारतीय शीशमहल क्रिकेट प्रतियोगिता के साïथ आगरा के अखिल भारतीय शहीद क्रिकेट में अपने हाथ दिखाने वाले यशपाल शर्मा तीन वर्ष तक उत्तर प्रदेश टीम के कोच भी रहे। उनकी देखरेख में कप्तान ज्ञानेन्द्र पाण्डेय ने रणजी ट्राफी में उत्तर प्रदेश की टीम से शानदार प्रदर्शन कराने में भी सफलता प्राप्त की।मध्य क्रम के बेहतरीन बल्लेबाज यशपाल शर्मा को जुझारूपन के चलते सात वर्ष तक कोई भी गेंदबाज उनको शून्य पर आउट नहीं कर पाया। पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर ज्ञानेन्द्र पाण्डेय ने बताया कि यश पाजी के साथ मेरा काफी लम्बा तथा पुराना अनुभव रहा है। वह घरेलू क्रिकेट को काफी प्रोत्साहित भी करते थे।यशपाल शर्मा की मौत की खबर आज सुबह मिलने पर ज्ञानेन्द्र पाïण्डेय को यकीन ही नहीं हुआ। यशपाल शर्मा के जुझारूपन को देखते हुए उनको रणजी टीम का कोच बनाया गया। उस समय टीम के कप्तान ज्ञानेन्द्र पाण्डेय थे। ज्ञानेन्द्र ने बताया कि उन्होंने बतौर कोच उत्तर प्रदेश की रणजी ट्राफी टीम के हर सदस्य को मानसिक रूप से भी काफी मजबूत किया। यशपाल शर्मा वर्ष 2000 से 2002 तक रणजी ट्राफी में उत्तर प्रदेश की रणजी टीम के मुख्य कोच रहे। ज्ञानेन्द्र ने बताया कि वह संतुलित टीम बनाने के लिए सभी के प्रदर्शन पर प्रमुखता से नजर रखते थे। वह हमेशा खिलाडिय़ों को हर फार्मेट में बेहतर करने के लिए प्रेरित कर मैदान में खूब अभ्यास कराते थे। हर टीम के खिलाफ उनका नजरिया अलग ही होता था। वह टीम को जीत के ट्रैक पर लाने के लिए अक्सर गुस्सा हो जाते थे। उनका हर खिलाड़ी के साथ बेहतर तालमेल रहता था। उस दौर में उत्तर प्रदेश को दो मैचों में हार के बाद कोच यशपाल शर्मा गुस्सा होकर ड्रेसिंग रूम छोड़कर चले गए थे। इसका बड़ा असर हो गया। टीम ने अगले दो मैचों में राजस्थान और विदर्भ पटखनी देकर नाकआउट में प्रवेश किया था।ज्ञानेन्द्र ने कहा कि वाकई यशपाल पाजी का जवाब नहीं था। जब वह कोच बनाए गए तो तब तक उनके बारे में बहुत नहीं जानता था। एक सीनियर क्रिकेटर के नाते तो मैं कई बार उनसे मिला लेकिन कभी बहुत बातचीत नहीं हुई। ज्ञानेन्द्र ने बताया कि उन दिनों मैं गेंदबाजी कम करने लगा था, इसको लेकर वह काफी नाराज हो गए। वह मुझे बतौर गेंदबाज अच्छा प्रदर्शन करते हुए पहले ही देख चुके थे। इसके बाद व्यक्तिगत रूप से मुझे गेंदबाजी के टिप्स देते थे। कोच की कमान संभालने के बाद एक दिन नेट पर मुझे गेंदबाजी करते हुए बोले...तू मैच में लंबी बॉंलिंग क्यों नहीं करता। मैच में भी बालिंग किया कर यार....तेरी गेंद में वेरीऐशन है, जमकर विकेट निकालेगा। यश पाजी के प्रोत्साहन के बाद से ही मै मैचों में भी नियमित गेंद डालने लगा। गेंदबाजी में यश पाजी ने ही आत्मविवास बढ़ाया जिसके कारण इतने विकेट लेने में सफल रहा। वह बिंदास व्यक्ति और महान क्रिकेटर थे। उत्तर प्रदेश की टीम को छोडऩे के बाद भी वह लगातार मुझे फोन पर समझाते रहते थे।

 

उनके आते ही ड्रे्सिंग रूम में गूंजते थे हंसी के ठहाके:-पूर्व क्रिकेटर और उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री मोहसिन रजा ने बताया कि यशपाल भाई को कुछ दिनों पहले ही फोन आया था। नोएडा में उनका एक काम था, नहीं पता था कि इतनी जल्दी वह हम सबको छोड़कर चले जाएंगे। शीशमहल क्रिकेट टूर्नामेंट में यशपाल भाई खेलने आते थे। मैच कैसा भी हो किसी भी स्थिति में हो अगर ड्रे्सिंग रूम में यशपाल भाई हैं तो फिर हंसी मजाक के अलावा कुछ नहीं होता था। यशपाल भाई को लखनऊ बहुत अच्छा लगता था। वह कहते थे यार मोहसिन तेरा शहर बहुत अच्छा है। 

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