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-राहुल लाल (कूटनीतिक मामलों के विशेषज्ञ)


केंद्र सरकार ने बैंक ऑफ बड़ौदा,विजया बैंक और देना बैंक के विलय का फैसला लिया है।तीनों को मिलाकर बनने वाला नया बैंक देश का तीसरा सबसे बड़ा बैंक होगा।विलय के प्रस्ताव पर अब तीनों बैंकों के बोर्ड विचार करेंगे।परंतु अब वह केवल औपचारिकता भर है।सरकार का यह कदम उसकी इस सोच का ताजा नमूना है कि उसे लगता है कि सरकारी बैंकों को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।इस विलय को फंसे हुए कर्ज की समस्या के दवा के तौर पर देखा जा रहा है।सरकार का कहना है कि तीनों बैंक विलय के बाद भी स्वतंत्र रूप से काम करना जारी रखेंगे और सभी बैंक कर्मचारियों की नौकरी सुरक्षित है।यह पहला मौका है,जब तीन बैंकों के एकीकरण की पहल सरकार ने की है।इससे पूर्व स्टेट ऑफ इंडिया और उसके 5 सहयोगी बैंकों का विलय तथा एसबीआई द्वारा भारतीय महिला बैंक का अधिग्रहण किया जा चुका है।उल्लेखनीय है कि देश में कुल 21 सरकारी बैंक हैं,जिनकी अधिकांश हिस्सेदारी सरकार के पास है।इन तीन बैंकों के विलय के बाद देश में 19 सरकारी बैंक रह जाएँगें।इन सरकारी बैंकों की एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की बैंक परिसंपत्ति में दो तिहाई से अधिक हिस्सेदारी है।हालांकि इसके साथ इन सार्वजनिक बैंकों की फंसे कर्ज में भी बड़ी हिस्सेदारी है।साथ ही वैश्विक बेसल-तीन पूँजीगत नियमों के अनुपालन के लिए अगले दो साल में करोड़ों रूपये चाहिए।
सरकार ने यह कदम ऐसे समय में उठाया है,जब फंसे कर्ज की मार झेल रहे देना बैंक का शुद्ध एनपीए 11 फीसदी से अधिक हो गया है और रिजर्व बैंक ने इसे पीसीए यानी प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन श्रेणी में डाल दिया है।ऐसे में इस बैंक पर कई तरह की बंदिशे लग गई हैं।वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना है कि बैंक कर्ज में वृद्धि से कारपोरेट सेक्टर के निवेश पर असर पड़ रहा था।कई बैंक एनपीए बढ़ने की वजह से नाजुक स्थिति में पहुँच गए थे।इसलिए तीन बैंकों के विलय के बाद जो बैंक बनेगा,उससे बैंकिंग ऑपरेशन में सुधार आएगा।दूसरे शब्दों में सरकार मानती है कि यह बैंक विलय का निर्णय न केवल बैंकों के कर्ज देने की क्षमता में वृद्धि करेगी,अपितु बैंकिग प्रणाली को दुरूस्त करने तथा आर्थिक वृद्धि को गति देने के सरकार के प्रयासों को गतिमान बनाएगी।माना जा रहा है कि तीनों बैंक विलय प्रक्रिया तय सीमा में निपटाएंगे और वित्त वर्ष 2018-19 के अंत तक सभी जरुरी नियामकीय प्रक्रिया पूरी होने की उम्मीद है।नया बैंक 1 अप्रैल 2019 से चालू हो जाएगा।

विलय के पक्ष में सरकार के अन्य तर्क--
सरकार को उम्मीद है कि बैंक ऑफ बड़ौदा,देना बैंक तथा विजया बैंक के प्रस्तावित विलय से बैंक शाखाओं की संख्या कम होने से सालाना 10 अरब रुपये की बचत होने की उम्मीद है।बैंक ऑफ बड़ौदा और देना बैंक की शाखाएँ आसपास के इलाकों में ही है और इससे कम से कम 1000 जगहों पर शाखाओं का एकीकरण हो सकता है,जिससे 10-12 अरब रुपये की बचत हो सकेगी।

क्या होगा नए बैंक का हाल??
तीनों बैंकों के विलय के बाद जो नया बैंक बनेगा,उसमें तीनों बैंकों के कर्मचारी होंगे।अभी बैंक ऑफ बड़ौदा में 56,361 ,विजया बैंक में 15,874 और देना बैंक में 13,400 कर्मचारी काम कर रहे हैं।ये सब मिलकर नए बैंक में कुल 85,615 कर्मचारी होंगे।इसी तरह बैंक ऑफ बड़ौदा का कुल कारोबार 10,29,811 करोड़ रूपये है,वहीं विजया बैंक का कारोबार 2,79,674 करोड़ तथा देना बैंक का 1,74,931 करोड़ रुपये है।इस तरह नए बैंक का कुल कारोबार 14,82,422 करोड़ रूपये का होगा।
एनपीए के लिहाज से देखें तो बैंक ऑफ बड़ौदा का नेट एनपीए फिलहाल 5.4%,विजया बैंक का 4.1% और देना बैंक का 11.4% है।इस तरह तीनों बैंकों के विलय के बाद औसत 5.7% होगा,जो सरकारी बैंकों के औसत 12.13% से अच्छा रहेगा।इसी तरह इन बैंकों का सीएएसआर अनुपात यानी तीनों बैंकों में चालू और बचत खाते में जमा राशि का अनुपात 34 फीसदी होगा।इन तीनों बैंकों का लागत-आय अनुपात भी 48.94% होगा,जबकि सरकारी बैंकों का औसत लागत आय अनुपात 53.92% है।इसी तरह तीनों बैंकों का सीआरएआर यानी कैपिटल टू रिस्क असेट रेश्यो भी 12.25% होगा,जबकि निर्धारित नियमानुसार यह 10.875% ही होना चाहिए।तीनों बैंकों का प्रॉविजनल कवरेज रेश्यो भी इन सरकारी बैंकों के औसत से अच्छा होगा।

विलय की चुनौतियाँ---
तीनों बैंकों की शाखाओं के एकीकरण और इसकी प्रक्रिया विलय की बड़ी चुनौती होगी।पिछले वर्ष स्टेट बैंक में उसके 5 संबद्ध बैंकों के विलय के बाद ,इस वर्ष एलआईसी द्वारा आईडीबीआई बैंक के अधिग्रहण प्रस्ताव की बात सामने आई थी।इस समावेशन प्रक्रिया के पीछे असली प्रेरणा थी कि व्यवस्था में फंसे हुए कर्ज की समस्या से निपटना।ऐसे विलयों की उपादेयता का आकलन करने के लिए अतीत में जाना आवश्यक है।अतीत में हुए ऐसे ही विलयों का रिकॉर्ड भी बहुत अच्छा नहीं है।
स्टेट बैंक ऑफ सौराष्ट्र और स्टेट बैंक ऑफ इंदौर का विलय क्रमशः 2008 व 2010 में एसबीआई के साथ किया जा चुका है।सरकार की उन्नीस क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का विलय भी बीते सालों में कर चुकी है।न्यू बैंक ऑफ इंडिया और पंजाब नेशनल बैंक का विलय तथा ग्लोबल ट्रस्ट बैंक और ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स का विलय स्पष्टतः दिखता है कि इससे अधिग्रहीत और अधिग्रहणकर्ता में से किसी का भला नहीं हुआ।स्टेट बैंक का विलय भी एक और उदाहरण सामने रखता है।सरकारी बैंकों के सुदृढ़ीकरण की माँग नई नहीं है।आरबीआई के पूर्व गवर्नर एम नरसिम्हन के नेतृत्व वाले एक पैनल ने सन 1998 में ही भारतीय बैंकों के तीन स्तरीय ढांचे की बात कही थी।बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में बैंकिंग ढांचों के साथ मनमाना व्यवहार नहीं किया जा सकता।इसके बजाए नीति निर्माताओं को बाजार को बैंकों का आकार और स्वरूप निर्धारित करने देना चाहिए।रिजर्व बैंक ने बैंक लाइसेंसिंग को लेकर कहीं अधिक उदार व्याख्या अपनाई है।ऐसे परिदृश्य में सरकार द्वारा निर्देश देना कतई समझदारी नहीं लगता।दरअसल,बैंकों का विलय फंसे हुए कर्ज से निपटने का अल्पकालिक उपाय है,लेकिन असली समस्या इनके प्रबंधन और कामकाज के तरीके को लेकर है।सरकारी बैंकों के कामकाज और नियुक्तियों में सरकार का दखल स्थिति को खराब कर रही है।यही वजह है कि आज प्राइवेट बैंक कुल नए डिपॉजिट का करीब 70 प्रतिशत और इन्क्रीमेंटल लोन का 80% हिस्सा झटकने में कामयाब हैं।
सरकार का दावा है कि विलय से तीनों बैंकों के परिचालन में सुधार होगा और यह देश में छोटे-छोटे बैंकों के स्थान पर बड़े बैंक स्थापित करने की योजना का हिस्सा है।सरकार चाहती है कि देश में 6 बड़े बैंक होने चाहिए, ताकि उनके असफल होने की संभावना नहीं रहे।लेकिन एकीकरण के बाद भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का फलक विदेशी बैंकों से छोटा होगा,जैसे अमेरिका के 8 बैंकों की समग्र पूँजी वहाँ के जीडीपी का 60% है,वहीं इंग्लैंड और फ्रांस के चार बैंकों की समग्र पूँजी उनके देश के जीडीपी का तीन सौ प्रतिशत है,जबकि भारत में भविष्य के 6 बड़े बैंकोन की समग्र पूँजी देश के जीडीपी की महज एक तिहाई होगी।अमेरिका के सबसे बड़े बैंक जेपी मार्गन की पूँजी भारत के सबसे बड़े बैंक भारतीय स्टेट बैंक से 8 गुना ज्यादा है।साफ है,एकीकरण के बाद भी सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़े बैंक नहीं बन पाएंगें।
इसके अलावा सरकार का यह भी कहना कहना है कि विलय के बाद बने बैंक के ग्राहक आधार में तेजी से इजाफा होगा।साथ ही उसकी बाजार पहुंच,परिचालन,किफायत और उपभोक्ताओं के लिए उसके उत्पाद और सेवाओं में भी सुधार होने की बात कही जा रही है।परंतु जरूरी नहीं है कि हकीकत भी ऐसा ही हो।देना बैंक का ग्रोस एनपीए 22 फीसदी के उच्चतम दायरे में है।विजया बैंक का ग्रोस एनपीए 6.9% है और बैंक ऑफ बड़ौदा का 12. 4%। विलय के बाद बनने वाले बैंक का एनपीए करीब 13 फीसदी होगा।यह बैंक ऑफ बड़ौदा के मौजूदा 12.4% के स्तर से भी कमजोर होगा।आखिर सरकार बैंक ऑफ बड़ौदा के अंशधारकों को क्या संदेश देना चाहती है?
देना बैंक देश के सबसे कमजोर बैंकों में शामिल है,जबकि बैंक ऑफ बड़ौदा सबसे मजबूत बैंकों में।विजया बैंक छोटा लेकिन औसत वित्तीय स्थिति वाला है।ऐसे में स्पष्ट है कि दोनों बैंकों के वित्तीय बोझ को बैंक ऑफ बड़ौदा को ही उठाना पड़ेगा।एचडीएफसी रिपोर्ट के मुताबिक फंड की लागत और नेट ब्याज मार्जिन अर्थात एनआईएम पैमाने पर देना बैंक की स्थिति दूसरे दोनों बैंकों के मुकाबले खराब है।इसके आधार पर बैंक के वित्तीय स्वास्थ्य का पता लगता है।देना बैंक का एनआईएम 2.61 फीसदी है,जबकि बैंक ऑफ बड़ौदा का 2.92 फीसदी और विजया बैंक का 3.12 फीसदी है।एनआईएम बैंक की तरफ से दिए गए ब्याज और वसूले गए ब्याज का अंतर होता है।3 फीसदी से ज्यादा एनआईएम को बेहद अच्छा माना जाता है।इसी तरह देना बैंक की कॉस्ट ऑफ फंड 5.59 फीसदी है,जबकि विजया बैंक का 5.09 फीसदी और बैंक ऑफ बड़ौदा का 5.25 फीसदी।स्पष्ट है कि ऐसा विलय देश के मौजूदा वित्तीय संकट की वास्तविक वजह का भी निराकरण नहीं करता।
सर्वोत्तम तो यह होगा कि मजबूत बैंकों का विलय कर दिया जाए,क्योंकि उनके पास संसाधन हैं,उनकी सेहत और कार्य संस्कृति अच्छी है एवं उनके सामने विलय प्रक्रिया की जरुरतों को पूरा करने के सिवा कोई बाधा नहीं है।अगर हमने किसी बीमार बैंक का विलय किसी बड़े स्वस्थ बैंक के साथ कर दिया तो इसके विलय के वक्त स्वस्थ बैंक के लिए समस्याएँ उत्पन्न हो सकती है।देना बैंक की मौजूदा स्थिति विलय के बाद बने नए बैंक की क्षमता को भी प्रभावित करेगी।कमजोर या बीमार बैंकों के विलय पूर्व उनके सेहत में सुधार आवश्यक है।
तीन वर्ष पूर्व सरकार ने बैंक ऑफ बड़ौदा में निजी क्षेत्र के हाईप्रोफाइल प्रौफेनल्स की नियुक्ति कर उन्हें बैंक में की कायापलट करने का जिम्मा सौंपा था।पिछले तीन वर्ष में इन प्रोफेशनल्स और बैंक कर्मचारियों की मेहनत से तमाम तरह की अड़चनें दूर कर ली गई।बैंक ऑफ बड़ौदा अब एक नई उड़ान भरने की तैयारी कर रहा था,तभी बैंक को विलय का सामना करना पड़ रहा है।
विलय के बाद बने बैंक में टेक्नोलॉजी का एकीकरण एक बड़ा मसला है।बैंक ऑफ बड़ौदा ने हाल ही में अपनी कोर टेक्नोलॉजी को "फिनाकल 7" से "फिनाकल 10"में अपग्रेड किया है।अब तीनों बैंकों को उसी प्लेटफार्म में लाना एक बड़ी चुनौती है।तथ्य की बात करें तो 2014 की पी जे नायक समिति भी इस बात को स्पष्ट करती है कि सरकारी बैंकों के बोर्ड संचालन मानकों पर बहुत बुरी स्थिति से गुजर रहे हैं।केवल कमजोर बैंकों का अपेक्षाकृत मजबूत बैंकों के साथ विलय कर देना सरकार के लिए बेहतर कदम हो सकता है,लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ भी नहीं बदलता।
इस आलोक में बेहतर पूँजी प्रबंधन,ऋण प्रस्तावों के मूल्यांकन में गुणवत्ता का समावेश,फंसे कर्ज की वसूली के लिए ईमानदारी पूर्वक प्रयास, वसूली के मामले में बैंक अधिकारियों को प्रभावी अधिकार,भ्रष्टाचार पर नियंत्रण,कुशल मानव संसाधन की ज्यादा से ज्यादा भर्ती, राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्ति ही बैंकिंग सेक्टर को बेहतर प्रदर्शन की ओर अग्रसर कर सकता है।

 


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*21 अक्टूबर हो सकती है कॉन्सर्ट की तारीख
नई दिल्ली (हम हिंदुस्तानी)-संगीतकार राज महाजन के फैन्स के लिए अच्छी खबर है कि राज महाजन ने अपने अगले कॉन्सर्ट की घोषणा कर दी है जोकि अक्टूबर 2018 में होगा. कार्यक्रम की तारीख 21 अक्टूबर हो सकती है. कार्यक्रम दिल्ली में किसी ऑडिटोरियम में होगा.
‘डॉलीवुड नाईट’ के नाम से होने वाले प्रोग्राम में बॉलीवुड का तड़का भी लगेगा और कई सितारे भी भाग लेंगे. इस कार्यक्रम में राज महाजन के हिट गानों की यात्रा को दिखाया जाएगा. कार्यक्रम मे सुरीले सिंगर राज महाजन के निर्देशन में परफॉर्म करेंगे.
राज महाजन ने बताया, “इस कॉन्सर्ट में गानों के साथ थोडा ड्रामा भी रहेगा. डांस की कोरियोग्राफी के लिए कोरेओग्राफर की तलाश जारी है. ज़्यादातर गानों को ओरिजिनल गायक ही परफॉर्म करेंगे. कुछ नए चेहरे और नयी आवाजें भी देखने और सुनने को मिल सकते हैं. कॉन्सर्ट की थीम ‘राज महाजन की संगीत यात्रा रहेगी. इस कॉन्सर्ट में कई जानी-मानी हस्तियाँ भाग लेंगी. जल्द ही कार्यक्रम की तारीख, कलाकारों, सेलेब्रिटी मेहमानों के नामो की घोषणा कर दी जायेगी.”
21 अक्टूबर को राज महाजन का जन्मदिन है तो इस बार का राज महाजन का जन्मदिन कुछ ख़ास रहेगा. आधिकारिक तौर पर राज महाजन के 600 से ज्यादा गाने संगीतकार के तौर पर रिलीज़ हो चुके हैं. इसके अलावा ‘ओ शिट’ नाम से मशहूर कॉमेडी वेब-सीरीज के मुख्य चरित्र भी है राज. नेशनल टीवी पर पहले राज महाजन का टॉक-शो ‘म्यूजिक मस्ती विद राज महाजन’ हर इतवार को ब्रॉडकास्ट होता था.
‘डॉलीवुड नाईट’ का आयोजन इवेंट कंपनी मोक्ष इवेंट द्वारा क्या जाएगा जोकि मोक्ष म्यूजिक कम्पनी का ही एक भाग है.


दुबई (Hum Hindustani)- भारत ने एशिया कप में बुधवार को पाकिस्तान के खिलाफ शानदार प्रदर्शन करते हुए नया इतिहास बना दिया. उसने चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को 8 विकेट से हराया. भारत ने जब जीत दर्ज की, तब उसकी पारी में 126 गेंदें फेंकी जानी बाकी थीं. यह गेंद बाकी रहने के लिहाज से पाकिस्तान पर भारत की सबसे बड़ी जीत है. उसने इससे पहले 2006 में पाकिस्तान पर 105 गेंद बाकी रहते हुए जीत दर्ज की थी.

एशिया कप के पांचवें मैच में पूरी तरह भारत का दबदबा रहा. उसने टॉस जीतकर पहले बैटिंग करने वाले पाकिस्तान को महज 43.1 ओवर में 162 रन पर रोक दिया. इसके बाद जीत के लिए जरूरी रन 29 ओवर में 2 विकेट खोकर बना लिए.

भारतीय जीत के असली हीरो गेंदबाज रहे. भुवनेश्वर कुमार ने शुरुआती पांच ओवर में ही पाकिस्तान के दोनों ओपनरों को पवेलियन लौटा दिया. बीच के ओवर स्पिनरों के नाम रहे. इस दौरान पार्ट टाइम स्पिनर केदार जाधव ने तीन विकेट पाकिस्तान की कमर तोड़ दी. इसके बाद भुवनेश्वर और जसप्रीत बुमराह ने जल्दी-जल्दी विकेट झटककर पाकिस्तान को 50 ओवर से पहले ही ऑलआउट कर दिया.
रोहित-धवन ने 86 रन की साझेदारी की
छोटे लक्ष्य का पीछा करने उतरी भारतीय टीम ने अच्छी शुरुआत की. कप्तान रोहित शर्मा (52) और शिखर धवन (46) ने पहले विकेट के लिए 86 रन की साझेदारी की. रोहित शर्मा अर्धशतक बनाने के ठीक बाद शादाब की गुगली का शिकार बने. धवन अर्धशतक के करीब पहुंचकर प्वाइंट पर कैच दे बैठे. जब वे आउट हुए तब टीम का स्कोर 104 रन हो चुका था. इसके बाद अंबति रायुडू और दिनेश कार्तिक ने टीम को लक्ष्य तक पहुंचा दिया.

भारत की 53वीं जीत
भारत की यह पाकिस्तान के खिलाफ 53वीं जीत है. दोनों टीमों के बीच वनडे में अब तक 130 मैच हुए हैं. पाकिस्तान ने इनमें से 73 मैच जीते हैं. दोनों टीमों के बीच चार मैच बेनतीजा रहे हैं.

एशिया कप में सातवीं जीत
भारत ने पाकिस्तान को एशिया कप में सातवीं बार हराया है. उसने इनमें से छह मैच वनडे फॉर्मेट और एक मैच टी20 फॉर्मेट में जीते हैं. साल 2016 में एशिया कप टी20 फॉर्मेट में खेला गया था. पाकिस्तान ने एशिया कप में भारत को 5 बार हराया है.

अब 23 सितंबर को सामना
भारत और पाकिस्तान की टीमें अब 23 सितंबर को आमने सामने होंगी. यह सुपर-4 राउंड का मैच होगा. बांग्लादेश और अफगानिस्तान भी सुपर-4 में पहुंच चुके हैं. सुपर-4 राउंड में बेहतर प्रदर्शन करने वाली दो टीमें फाइनल में जगह बनाएंगी. फाइनल मुकाबला 28 सितंबर को खेला जाएगा.

नई दिल्‍ली। बदलते दौर में जिस तेजी से रक्षा तकनीक में बदलाव आया है उसको देखते हुए हर देश अपनी सुरक्षा के लिए लगातार बेहतर करने की कोशिशों में लगा हुआ है। अमेरिका, चीन, रूस समेत दुनिया के सभी विकसित देश पहले ही काफी मजबूत स्थिति में है। ऐसे में भारत भी अपनी सुरक्षा के नए आयाम तलाश करने में लगा है। भारत के इस नए आयाम का नाम है ई-बम। यह घातक होने के साथ ही दुश्‍मन को हमारे सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर देगा। डीआरडीओ इस तकनीक पर काफी लंबे समय से काम कर रहा है। इतना ही नहीं भारत इस तकनीक पर काम करने वाला फिलहाल एशिया का पहला देश है। इसके अलावा अमेरिका में भी इस तकनीक पर काम हो रहा है। इस पूरी लड़ाई के खाके को वैज्ञानिक इलैक्‍ट्रानिक वारफेयर का नाम देते हैं, जहां निशाने पर दुश्‍मन की फौज बाद में होती है, पहले उसके संचालन में काम आने वाले इलैक्‍ट्रानिक डिवाइस होते हैं।
अमेरिका बना रहा चैंप:-आपको बता दें कि अमेरिका ने अपने इस हाईटैक वैपन प्रोजेक्‍ट का नाम चैंप दिया है। इसकी खासियत यह है कि वैपन इंसान को नुकसान पहुंचाए बिना अपना काम करेगा। इसका टारगेट केवल कुछ मशीनें होंगी। दरअसल, यह वही तकनीक है जिस पर भारत भी काम कर रहा है। इस हाईटेक डिफेंस सिस्‍टम का नाम इलैक्‍ट्रोमैगनेटिक पल्‍स वैपन सिस्‍टम है। यह हथियार भविष्‍य में युद्ध की तस्‍वीर को पूरी तरह से बदल कर रख देगा।
कैसे करेगा काम:-इसमें एक ड्रान टाइप वैपन खास इमारतों के ऊपर से गुजरता हुआ एक मैगनेटिक फील्‍ड बनाता है। इसके सहारे एक करंट छोड़ा जाता है जिससे इमारत में रखे सभी इलैक्‍ट्रोनिक सिस्‍टम जिसमें कंप्‍यूटर भी शामिल होता है, काम करना बंद कर देता है। यह वैपन सेना और सरकार की मदद के लिए साबित होने वाली उन तमाम चीजों को पंगु बना देता है जिनसे जानकारी लेकर वह आगे का फैसला करते हैं या अपनी रणनीति बनाते हैं। ईएमपी वैपन सिस्‍टम वास्‍तव में सेना और सरकार की मदद कर रहे कंप्‍यूटर के लिए घातक साबित होता है। यह हवा में रहते हुए ही उन तमाम सिस्‍टम को पूरी तरह से नाकाम बना देता है जो सेना और सरकार की रणनीति बनाने में सहायक साबित हो सकते हैं। इसको यदि दूसरे शब्‍दों में कहा जाए तो कंप्‍यूटर के नाकाम हो जाने के बाद सैटेलाइट से इनका कनेक्‍शन खत्‍म हो जाता है।
टूट जाएगा कनेक्‍शन:-इसका सबसे घातक परिणाम यह होगा कि सैटेलाइट से कनेक्‍शन टूट जाने की वजह से सीमा पर चौकसी कर रही सेना का संपर्क भी एक दूसरे से टूट जाएगा। ऐसे में न तो किसी फैसले की जानकारी सुरक्षाबलों तक पहुंचाई जा सकेगी और न ही उनका कोई आपात संदेश ही आ सकेगा। यह किसी भी देश के लिए सबसे घातक होगा। ऐसे वक्‍त में कोई भी देश अपनी सुरक्षा करने में पूरी तरह से विफल हो जाएगा और उस वक्‍त यदि उस पर हमला होता है तो वह कुछ नहीं कर पाएगा।
लेजर वेपन से ज्‍यादा घातक है काली:-यह सिर्फ एक प्रोजेक्‍ट ही नहीं है जो भारत की सुरक्षा के लिए अहम भूमिका निभाएगा। इसके अलावा भारतीय वैज्ञानिक काली नाम की दूसरी तकनीक पर भी काम कर रहा है। काली का अर्थ है किलो एंपेयर लाइनर इंजेक्‍टर। इस हाईटेक डिफेंस सिस्‍टम की सबसे बड़ी खासियत है कि यह हमारी तरफ आने वाली किसी भी मिसाइल को पूरी तरह से नाकाम बना देता है। दुश्‍मन की मिसाइल की पहचान के साथ ही इस सिस्‍टम से पावरफुल बीम निकलती है जो हमारी तरफ आने वाली मिसाइल के अंदर मौजूद तमाम उपकरणों को फेल कर देती है। काली दरअसल किसी भी दूसरे लेजर वेपन से ज्‍यादा खतरनाक है। लेजर वेपन और इसमें यही फर्क है कि लेजर वेपन किसी भी मिसाइल में छेद कर उसको तबाह कर देती है, लेकिन काली में यह सब नहीं होता है।

नई दिल्‍ली। क्‍या अाप भी ऑनलाइन गेम्‍स में दिलचस्‍पी रखते हैं, तो इस खबर को आप जरूर पढ़ें। यदि आप शादीशुदा हैं या रिलेशनशिप में हैं तो यह आपके लिए यह बेहद उपयोगी और सचेत करने वाली हो सकती है। जी हां, फोर्टनाइट बैटल रोयाल नामक ऑनलाइन गेम दांपत्य जीवन में जहर घोल रहा है। यह गेम जाने-अनजाने आपके जीवनसाथी के बीच दरार डाल रहा है। मर्दों में इस गेम के प्रति गजब की दीवानगी है और उनकी यही लत जीवनसाथी से अलगाव का सबब बन रही है।
भारत में 200 से अधिक तलाक के लिए जिम्‍मेदार है ये गेम:-जी हां, अपना देश भी इस गेम से अछूता नहीं है। यहां भी इस इसके काफी दीवाने हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक जनवरी से अगस्‍त 2018 के बीच देश में हुए 200 से अधिक तलाक के लिए अकेले फोर्टनाइट बैटल रोयाल गेम का नशा या लत ही जिम्‍मेदार था। यह गेम जीवनसाथी के बीच में दूरियां या अलगाव पैदा कर रहा है। ब्रिटेन में तो इस गेम को लेकर बाकायदा चेतावनी जारी की गई है। ब्रिटेन में हाल ही में हुए एक सर्वे में सोशल मीडिया और पार्न साइटों की दीवानगी को भी शादी में दरार के लिए भी दोषी ठहराया गया है।
ब्रिटेन में टूट रहे रिश्‍ते:-डियोर्स ऑनलाइन की यह रिपोर्ट चौंकाने वाली है। रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन में इस साल 4,665 तलाक हो चुके हैं। इनमें से लगभग पांच फीसद तलाक के लिए फोर्टनाइट बैटल रोयाल गेम काे जिम्‍मेदार माना गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जीवनसाथी का दिन-रात फोर्टनाइट बैटल रोयाल गेम से चिपके रहने के चलते पहले जीवनसाथी के बीच अनबन और बाद में अलगाव की स्थिति बनी। पीड़‍ि‍तों का कहना है कि इस गेम का नशा सिगरेट या शराब से कम घातक नहीं है। प्रतिद्वंद्वियों से अागे निकलने की होड़ में पार्टनर बात करना तो दूर कई बार उनकी तरफ आंख उठाकर भी नहीं देखते हैं।
गेम की खूबियां:-यह गेम एक मनहूस द्वीप पर खूद का अस्तित्‍व बनाए रखने की जद्दोजहद से जुड़ा है। इसे खेलने के लिए खिलाड़‍ियों को खुद का ऑनलान अवतार तैयार करना होता है। यह गेम 100 खिलाडि़यों से शुरू होता है। अलग-अलग टास्‍क पूरा कर खुद को जिंदा रखने की चुनौती होती है। तमाम बधाएं पार करके अंत तक जीवन बचने वाला विजेता घोषित किया जाता है। एंड्रायड और आइओएस फोन के अलावा घरेलू वीडियो गेम पर भी यह गेम मुफ्त में उपलब्‍ध है।
चार करोड़ लोग इस खेल के दीवाने:-दुनिया में इस खेल के प्रति दिलचस्‍पी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि चार करोड़ लोग इस खेल के दीवाने हैं। हर महीने औसतन चार करोड़ लोग इस खेल को खेलते भी हैं। 12.5 करोड़ लोगों ने गेम लांच होने के एक साल के भीतर इस डाउनलोड भी किया।
कोच से सीख रहे बारीक‍ियां:-फोर्टनाइट बैटल रोयाल गेम के प्रति लोगों का जनून इस कदर है कि प्रतिद्वंद्वियों को मात देने की कोशिश में युवा गेम कोच की सेवाएं लेने से भी नहीं चूक रहे है। प्रतिद्वंद्वियों की मानसिकता समझने के लिए लोग कोच की मदद ले रहे हैं। इसके लिए ब्रिटेन में लोग 10 से 20 पाउंड यानी लगभग एक से दो हजार रुपये मासिक भुगतान कर रहे हैं।

नई दिल्‍ली। असम में नेशनल रजिस्‍टर फॉर सिटिजंस(एनआरसी) के मुद्दे पर जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की डिवीज़न बेंच ने कहा है कि दावे तथा आपत्तियां दायर किए जाने की प्रक्रिया 25 सितंबर से शुरू होगी और 60 दिन तक यानि 25 नवंबर तक जारी रहेगी। इस दौरान वे व्‍यक्ति अपना दावा पेश कर सकते हैं, जिनका नाम सूची में नहीं है।पिछली सुनवाई में असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) पर दावा और आपत्ति करने की तारीख सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक के लिए बढ़ा दिया था। जस्टिस रंजन गोगोई और आरएफ नरीमन की पीठ ने एनआरसी के राज्य संयोजक प्रतीक हजेला की रिपोर्ट को देखने के बाद यह आदेश दिया था। इसमें कहा गया था कि किसी व्यक्ति द्वारा नागरिकता के लिए 'लिस्ट ए' में सुझाए गए 10 में से किसी एक दस्तावेज पर विश्वास किया जा सकता है।उल्लेखनीय है कि 30 जुलाई को असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का आखिरी मसौदा जारी हुआ था। इसमें 40 लाख से ज्यादा लोगों का नाम शामिल नहीं था। इन लोगों के बारे में कहा गया कि वे अपनी नागरिकता के वैध दस्तावेज नहीं दे पाए।

सतना। सतना जिले के शाहपुर गांव की रहने वाली विमला कुशवाहा पति स्व. रामाश्रय कुशवाहा ने आर्थिक तंगी के चलते मंगलवार को अपने दो बच्चों को पहले कुएं फेंक दिया और बाद में खुद फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।ताला थाना प्रभारी कपूर त्रिपाठी ने बताया कि विमला कुशवाहा अत्यंत गरीबी में जीवन बसर कर रही थी। उसके पति की मौत भी 6 महीने पहले आत्महत्या करने से हुई थी। विमला ने अपने बेटे हर्ष कुशवाहा (3) व पुत्री नैंसी कुशवाहा (5) को कुएं में फेंक दिया। विमला कुएं में बच्चों को डूबते हुए देख रही थी। बच्चे जब डूब गए तो उसने घर में जाकर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।पता चला है कि महिला के पति ने गांव के ही एक व्यक्ति से 25 हजार का कर्ज ले रखा था। पति की मौत के बाद यह कर्ज महिला को चुकाना था। इससे भी वह परेशान थी। विमला पति की मौत के बाद मजदूरी कर बच्चों को पालती थी, लेकिन कुछ दिन से उसके खाने तक की स्थिति खराब थी। इसके कारण वह तनाव में थी। अंतत: उसने तंग आकर मौत को गले लगा लिया।

कोच्चि। केरल नन दुष्कर्म मामले में जालंधर के आरोपी बिशप मुलक्कल कोच्चि के सीबीआइ दफ्तर पहुंचे। यहां सीआइडी की पांच सदस्यों की टीम उनसे पूछताछ करेगी। बिशप फ्रैंको ने दावा किया कि उन पर लगाए गए सभी आरोप एक झूठी कहानी है जिसका उद्देश्य सिर्फ बदला लेना है। बता दें कि एक नन ने बिशप पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था।
बिशप को नहीं मिली अग्रिम जमानत:-केरल हाई कोर्ट ने मंगलवार को नन के साथ दुष्कर्म के आरोपी बिशप फ्रैंको मुलक्कल को अग्रिम जमानत नहीं दी। अब मामले की अगली सुनवाई 25 सितंबर को होगी। वहीं आरोपी बिशप फ्रैंको मुलक्कल ने अदालत से कहा कि उनकी गिरफ्तारी तब तक नहीं हो, जब तक कि अग्रिम जमानत याचिका पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता। उनका कहना है कि शिकायत झूठी है और यह सब उन्हें प्रताड़ित करने के मकसद से किया जा रहा है।
बिशप ने अस्‍थाई तौर पर छोड़ा पद:-केरल में नन के साथ दुष्कर्म मामले में आरोपों का सामना कर रहे जालंधर के बिशप फ्रैंको मुलक्कल ने अस्थाई तौर पर अपना पद छोड़ दिया है। माना जा रहा है कि फ्रैंको को 19 सितंबर को केरल पुलिस के समक्ष पेश होकर जांच का सामना करना है, इसी कारण उन्होंने अपना पद छोड़ दिया है। फ्रैंको ने अपने पद के लिए उत्तराधिकारी भी नियुक्त किया है। फ्रैंको खुद सामने नहीं आए, मीडिया रिपोर्ट के अनुसार फ्रैंको का कहना है कि उनको केरल पुलिस के सामने जांच के लिए पेश होना है, इसिलए वे फिलहाल पद छोड़ रहे हैं।

 

 

देश में तीन साल पहले जिस डिजिटल इंडिया नामक अभियान की जोरदार शुरुआत हुई थी, उसका एक उद्देश्य रुपये-पैसे के लेनदेन के डिजिटल उपायों में बढ़ोतरी करना भी था। सोचा गया था कि नकदी की जगह धन के हर तरह के ट्रांजेक्शन (लेनदेन) का यह तरीका देश को एक नए मुकाम पर ले जाएगा, लेकिन यह क्रांति आम जनता को फायदा पहुंचाने के बजाय जिस तरह से हर दूसरे व्यक्ति को चूना लगाने की तरफ मुड़ गई है- इसे देखकर हर कोई हैरान है। इधर दिल्ली-एनसीआर में कुछ ही दिनों के अंदर एटीएम कार्ड फ्रॉड की सैकड़ों शिकायतें मिलने का मामला ही चर्चा में नहीं है, बल्कि पश्चिम बंगाल से लेकर देश के दूरदराज के क्षेत्रों में हर दिन एटीएम फ्रॉड, बीपीओ के जरिये देश-विदेश में ठगी, क्लोनिंग के जरिये क्रेडिट कार्ड से बिना जानकारी धन-निकासी और बड़ी कंपनियों के अकाउंट व वेबसाइट की हैकिंग और फिरौती वसूली की घटनाएं हो रही हैं। ये घटनाएं हमें यह सोचने को मजबूर कर रही हैं कि हमारी डिजिटल क्रांति आखिर किस राह जा रही है और यह आम लोगों के फायदे की जगह नुकसान का सबब क्यों बन गई है।
किस्म-किस्म की साइबर ठगी:-इधर दिल्ली में एटीएम कार्ड की क्लोनिंग करके सैकड़ों लोगों के अकाउंट से हजारों-लाखों रुपये उड़ाने का मामला चर्चा में है। दावा किया जा रहा है कि इस तरह की धोखाधड़ी अक्सर रात में 12 बजे के आसपास होती है, क्योंकि ज्यादातर लोग उस वक्त नींद में होने के कारण खाते से धन निकासी का ईमेल और एसएमएम देख नहीं पाते हैं। सुबह होने पर जब वे यह संदेश देखते हैं, तब तक खाते से कई बार पैसे निकाले जा चुके होते हैं। गौरतलब है कि इस किस्म की साइबर ठगी के शिकार हुए लोग डिजिटल सुरक्षा के उपायों से पूरी तरह अनभिज्ञ नहीं कहे जा सकते हैं। इनमें से अधिकांश लोग पढ़े-लिखे हैं, लेकिन एटीएम मशीनों में ठगों द्वारा चोरीछिपे ग्राहकों के कार्ड की सूचनाएं पढ़ने के लिए लगाई गई डिवाइसों (स्कीमर) के कारण अथवा अनजाने में फोन पर मांगी जाने वाली सूचना देने पर वे जालसाजी के शिकार हो जाते हैं।कई मामलों में साबित हुआ है कि साइबर क्राइम करने वाले जालसाज लोगों से फोन पर उनके खाते के बारे में आने वाले ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) मांगते हैं और लोग उन्हें बैंककर्मी मानते हुए उन पर भरोसा करके वे सारी सूचनाएं आराम से दे देते हैं। इसके बाद जब उनके साथ फ्रॉड होता है तो उन्हें अपनी गलती का अहसास होता है, लेकिन सभी मामलों में ऐसा नहीं है। जालसाजी की बहुत सी घटनाओं से साबित हुआ है कि उपभोक्ता ने सारी सावधानियां बरतीं, लेकिन हैकिंग अथवा एटीएम मशीनों में अपराधियों द्वारा लगाई गई स्कीमर जैसी डिवाइसों से उनके कार्ड की सूचनाएं (कार्ड नंबर, सीवीवी और पासवर्ड) पढ़ ली गईं, जिनका बाद में दुरुपयोग किया गया। यह भी उल्लेखनीय है कि बैंकिंग से जुड़े सुरक्षात्मक उपायों की साइबर अपराधियों ने हवा निकालकर रख दी है और वे डिजिटल उपाय करने वाले महारथियों से दो कदम आगे के जानकार साबित हो रहे हैं। इनके घोटाले के तौर-तरीकों को देखकर आज कोई इसे लेकर आश्वस्त नहीं हो सकता है कि जहां कहीं भी पैसे और सामान के लेनदेन का कोई डिजिटल उपाय काम में लाया जा रहा है, वह फूलप्रूफ है और उसमें धांधली की कोई गुंजाइश नहीं है। ऐसी हरकतें पूरे डिजिटल इंडिया अभियान को संकट में डाल रही हैं।
निशाने पर सिर्फ बैंक नहीं:-यह भी उल्लेखनीय है कि साइबर फ्रॉड की घटनाएं महज बैंकिंग तक सीमित नहीं हैं। पेट्रोल पंपों में चिप लगाकर कमतौली करने और फर्जी बीपीओ खड़े करके देश और विदेश में कुछ युवाओं ने अपनी कथित प्रतिभा का इस्तेमाल लोगों को ठगने में किया है। दो साल पहले महाराष्ट्र के सागर उर्फ सैगी नामक युवा ने जिस प्रकार रातोंरात बीपीओ फर्जीवाड़े के तहत विदेशियों को करोड़ों का चूना लगाया, उससे साबित हो गया है कि अगर कोई तकनीक की जानकारी का बेजा इस्तेमाल करना चाहे तो शुरुआत में ही उसे रोकने और उसकी धरपकड़ के ज्यादा इंतजाम अपने देश में नहीं हैं। हालांकि ऐसा पूरी दुनिया में हो रहा है। माना जाता है कि वर्ष 2015 में पूरी दुनिया में करीब 56 लाख साइबर हमले हुए, जिनसे दो करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित हुए। साल भर पहले अपने देश में भी कुछ ऐसा ही हादसा घटित हुआ था, जब एक सरकारी बैंक ने अपने छह लाख उपभोक्ताओं के एटीएम कार्ड पहले तो ब्लॉक कर दिए, फिर उन्हें ग्राहकों से वापस मंगा लिया।इस घटना के पीछे एटीएम कार्डों की क्लोनिंग को जिम्मेदार बताया जा रहा है, जिसके तहत क्लोन कार्डों की मदद से उपभोक्ताओं के खाते से धननिकासी की जा रही थी। देश में मौजूद करीब 2 लाख एटीएम के विशाल आंकड़े को देखते हुए यह संभव नहीं लगता है कि उनके जरिये वित्तीय लेनदेन करने वाला हर ग्राहक इतना सजग होगा कि वह पैसे निकालते वक्त हर सावधानी बरतेगा। मुमकिन भी है कि कई मामलों में ग्राहक समय पर और सही विधि से शिकायत करने में चूक जाएं और अंतत: उन्हें इसका घाटा उठाना पड़े। यही वजह है कि आज दुनिया में कोई भी बैंक तमाम उपाय करने के बावजूद इसकी गारंटी देने में समर्थ नहीं है कि उसके उपभोक्ताओं का पैसा पूरी तरह महफूज रहेगा, बल्कि इस संबंध में बैंक धोखाधड़ी की ज्यादातर जिम्मेदारी अपने उपभोक्ताओं पर ही डालने की कोशिश करते हैं।असल में बैंकिंग का सारा कामकाज घर बैठे कराने से लेकर कई तरह के वित्तीय लेनदेन का जो इंतजाम उपभोक्ताओं को इंटरनेट से जोड़कर किया गया है, उसने सुविधा के साथ-साथ कई मुसीबतें भी पैदा कर दी है। इंटरनेट, मोबाइल और एटीएम के मार्फत बैंकिंग के इंतजाम करते हुए एक तरफ बैंकों ने अपने दफ्तरों का आकार और कर्मचारी संख्या में कटौती की है तो दूसरी तरह ग्राहकों को इसके लिए हतोत्साहित किया है कि हर वाणिज्यिक काम के लिए बैंकों की शाखा में न जाएं। हालांकि हर बैंक दावा करता है कि उसने अपने सर्वरों तक हैकरों की पहुंच के रास्ते में कई बाधाएं कायम की है, लेकिन दुनिया भर के हैकरों ने कंप्यूटरों के नेटवर्क और सर्वरों में सेंधमारी करके साबित कर दिया है कि अगर बैंक व सरकारें डाल-डाल हैं, तो वे पात-पात हैं।
साइबर विशेषज्ञों का अभाव;-डिजिटल धोखाधड़ी पर हमारा ध्यान न जाने की कुछ वजहें अहम हैं। असल में पैसे के लेनदेन और सामानों की खरीद-फरोख्त के वक्त अगर बीच में कोई मशीनी इंतजाम है तो उसे बेईमान मानना कोई अक्लमंदी नहीं माना जाता, पर कोई लेनदेन करते समय हमारा ध्यान इस ओर नहीं जाता है कि अंतत: इस मशीनी प्रबंध के किसी एक सिरे पर गड़बड़ी करने वाला कोई इंसान मौजूद हो सकता है। यही वजह है कि साइबर हैकरों की तरफ हमारा ध्यान तभी जाता है जब वे कोई बड़ी वारदात को अंजाम दे चुके होते हैं। अक्सर यह देरी काफी नुकसानदेह साबित होती है। यह समस्या इसलिए ज्यादा गंभीर और बड़ी है, क्योंकि ऐसी गड़बड़ियों को रोकने में सक्षम विशेषज्ञों का अभाव है। हमारे देश में फिलहाल बमुश्किल छह-सात हजार साइबर विशेषज्ञ होंगे, जबकि पड़ोसी मुल्क चीन में सवा लाख और अमेरिका में एक लाख से ज्यादा लोग साइबर विशेषज्ञ के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।ब्रिटेन आदि मुल्कों में ऐसी धोखाधड़ी रोकने के लिए बाकायदा साइबर आर्मी गठित की जा चुकी है। अगर वित्तीय लेनदेन के साधानों को आम उपभोक्ताओं के हित सुरक्षित रखने वाला बनाना है और उन्हें डिजिटल धोखों से महफूज करना है तो इस मोर्चे पर तेजी से काम करने की जरूरत है। ध्यान रखना होगा कि लंबे अरसे से प्रतिभावान आइटी पेशेवरों की बदौलत भारत की गिनती आइटी क्षेत्र की महारथी देश के रूप में होती रही है। ऐसे में यदि डिजिटल अपराधी हमारी इस साख को बट्टा लगाने में सफल हो जाते हैं तो इस नाकामी के बड़े गहरे अर्थ लगाए जाएंगे। इससे लोगों का बैंकिंग व्यवस्था से ही भरोसा उठने का बड़ा खतरा है, बल्कि यह भी सकता है कि हमारे आइटी पेशेवरों की प्रतिष्ठा पर आंच आने लगे और आइटी-बीपीओ से संबंधी कामकाज उन मुल्कों में जाने लगे, जहां की साइबर सुरक्षा चुस्त-दुरुस्त मानी जाती है।लंबे समय से प्रतिभावान आइटी पेशेवरों की बदौलत भारत की गिनती आइटी क्षेत्र के महारथी देश के रूप में होती रही है। ऐसे में यदि डिजिटल अपराधी हमारी इस साख पर बट्टा लगाने में कामयाब हो जाते हैं तो इस नाकामी के बड़े गहरे अर्थ लगाए जाएंगे। इससे लोगों का बैंकिंग व्यवस्था से ही भरोसा उठने का खतरा नहीं है, बल्कि यह भी सकता है कि हमारे आइटी पेशेवरों की प्रतिष्ठा पर आंच आने लगे और आइटी-बीपीओ से संबंधी कामकाज उन देशों में जाने लगें जहां की साइबर सुरक्षा चुस्त-दुरुस्त मानी जाती है।

रांची। महात्मा गांधी ने गरीबों की दुर्दशा देख सादगी धारण कर ली थी, ठीक उसी तरह झारखंड के गरीब आदिवासियों को बदहाली से उबारने के लिए जीवन समर्पित कर देने वाले पद्मश्री अशोक भगत का उदाहरण है। भगत ने 32 साल पहले प्रण लिया था कि जब तक आदिवासियों के तन पर कपड़ा नहीं होगा, जब तक उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार उपलब्ध नहीं होगा और जब तक वनवासी मुख्य धारा से नहीं जुड़ जाएंगे, वे सिला वस्त्र नहीं पहनेंगे, सिर्फ धोती व गमछा ही धारण करेंगे।पद्मश्री से सम्मानित और विकास भारती संस्था, बिशुनपुर के सचिव अशोक भगत को सभी अब बाबा के नाम से ही पुकारते हैं। जनजातीय समाज के समेकित विकास के लिए प्रतिबद्ध भगत ने आदिवासियों के बीच काम करने के लिए वेश ही नहीं नाम तक बदल डाला। उत्तर प्रदेश के आजगमढ़ के किशुनदासपुर निवासी अशोक राय जब आरएसएस के वरिष्ठ अधिकारियों भाऊराव देवरस एवं राजेंद्र सिंह उर्फ रज्जू भैया की प्रेरणा से झारखंड के गुमला जिले के बिशुनपुर (उस समय के बिहार) में अपने तीन आइआइटीयन साथियों डॉ. महेश शर्मा, रजनीश अरोड़ा और स्व. राकेश पोपली के साथ काम करने आए तो कुछ लोगों ने सुझाव दिया कि जतरा ताना भगत की इस धरती पर यदि काम करना है तो उन्हीं के अनुसार रहना और जीना पड़ेगा।उन्होंने 1983 में अपना नाम बदल कर अशोक राय से अशोक भगत रख लिया, जो आज बाबा के रूप में प्रसिद्ध हो चुके हैं। इनके प्रयास से इलाके की स्थिति काफी बदल गई है।

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